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Monday, June 10, 2019

SCO-Shanghai Cooperation Organisation (शंघाई सहयोग संगठन)

Ashok Pradhan     June 10, 2019     No comments

SCO क्या है?

  • SCO एक स्थायी अंतर-सरकारी अंतर्राष्ट्रीय संगठन है।
  • यह एक यूरेशियन राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संगठन है, जिसका उद्देश्य संबंधित क्षेत्र में शांति, सुरक्षा व स्थिरता बनाए रखना है।
  • इसकी स्थापना 15 जून, 2001 को शंघाई में हुई थी।
  • SCO चार्टर पर वर्ष 2002 में हस्ताक्षर किए गए थे और यह वर्ष 2003 में लागू हआ।
  • यह चार्टर एक संवैधानिक दस्तावेज है जो संगठन के लक्ष्यों व सिद्धांतों आदि के साथ इसकी संरचना तथा प्रमुख गतिविधियों को रेखांकित करता है।
  • रूसी और चीनी SCO की आधिकारिक भाषाएँ हैं।

गठन

  • वर्ष 2001 में SCO की स्थापना से पूर्व कज़ाकिस्तान, चीन, किर्गिस्तान, रूस और ताजिकिस्तान ‘शंघाई-5’ नामक संगठन के सदस्य थे।
  • वर्ष 1996 में ‘शंघाई-5’ का गठन विसैन्यीकरण वार्ता की श्रृंखलाओं से हुआ था, जो चीन के साथ चार पूर्व सोवियत गणराज्यों ने सीमाओं पर स्थिरता के लिये किया था।
  • वर्ष 2001 में उज़्बेकिस्तान के संगठन में प्रवेश के बाद ‘शंघाई-5’ को SCO नाम दिया गया।
  • वर्ष 2017 में भारत तथा पाकिस्तान को इसके सदस्य का दर्जा मिला।

सदस्य देश

  • वर्तमान में इसके सदस्य देशों में कज़ाकिस्तान, चीन, किर्गिस्तान, रूस, ताजिकिस्तान, उज़्बेकिस्तान, भारत और पाकिस्तान शामिल हैं।

पर्यवेक्षक देश

  • अफगानिस्तान, बेलारूस, ईरान और मंगोलिया SCO के पर्यवेक्षक देशों में शामिल हैं।

वार्ता साझेदार देश

  • अज़रबैजान, आर्मेनिया, कंबोडिया, नेपाल, तुर्की और श्रीलंका इस संगठन के वार्ता साझेदार देश हैं।

SCO के लक्ष्य

  • सदस्य देशों के मध्य परस्पर विश्वास तथा सद्भाव को मज़बूत करना।
  • राजनैतिक, व्यापार एवं अर्थव्यवस्था, अनुसंधान व प्रौद्योगिकी तथा संस्कृति में प्रभावी सहयोग को बढ़ावा देना।
  • शिक्षा, ऊर्जा, परिवहन, पर्यटन, पर्यावरण संरक्षण, इत्यादि में क्षेत्रों में संबंधों को बढ़ाना।
  • संबंधित क्षेत्र में शांति, सुरक्षा व स्थिरता बनाए रखना तथा सुनिश्चिता प्रदान करना।
  • एक लोकतांत्रिक, निष्पक्ष एवं तर्कसंगत नव-अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक व आर्थिक व्यवस्था की स्थापना करना।

SCO के मार्गदर्शक सिद्धांत

  • पारस्परिक विश्वास, आपसी लाभ, समानता, आपसी परामर्श, सांस्कृतिक विविधता के लिए सम्मान तथा सामान्य विकास की अवधारणा पर आधारित आंतरिक नीति।
  • गुटनिरपेक्षता, किसी तीसरे देश को लक्ष्य न करना तथा उदार नीति पर आधारित बाह्य नीति।

SCO की संरचना

  • राष्ट्र प्रमुखों की परिषद: यह SCO का सर्वोच्च निकाय है जो अन्य राष्ट्रों एवं अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के साथ अपनी आंतरिक गतिविधियों के माध्यम से तथा बातचीत कर अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर विचार करती है।
  • शासन प्रमुखों की परिषद: SCO के अंतर्गत आर्थिक क्षेत्रों से संबंधित मुद्दों पर वार्ता कर निर्णय लेती है तथा संगठन के बजट को मंज़ूरी देती है।
  • विदेश मंत्रियों की परिषद: यह दिन-प्रतिदिन की गतिविधियों से संबंधित मुद्दों पर विचार करती है।
  • क्षेत्रीय आतंकवाद-रोधी संरचना (RATS.): आतंकवाद, अलगाववाद, पृथकतावाद, उग्रवाद तथा चरमपंथ से निपटने के मामले देखता है।
  • शंघाई सहयोग संगठन सचिवालय: यह सूचनात्मक, विश्लेषणात्मक तथा संगठनात्मक सहायता प्रदान करने हेतु बीजिंग में अवस्थित है।

SCO की प्रमुख गतिविधियाँ

  • प्रारंभ में SCO ने मध्य एशिया में आतंकवाद, अलगाववाद तथा उग्रवाद को रोकने हेतु परस्पर अंतर-क्षेत्रीय प्रयासों पर ध्यान केंद्रित किया।
  • वर्ष 2006 में, वैश्विक वित्त पोषण के स्रोत के रूप में अंतर्राष्ट्रीय मादक पदार्थों की तस्करी को शामिल करने हेतु संगठन की कार्यसूची को विस्तार दिया गया।
  • वर्ष 2008 में SCO ने अफगानिस्तान में स्थिरता लाने के लिए सक्रिय रूप से भाग लिया।
  • लगभग इसी समय SCO ने विभिन्न प्रकार की आर्थिक गतिविधियों में हिस्सा लेना शुरू किया।
  • इससे पहले वर्ष 2003 में अपने भौगोलिक क्षेत्र के भीतर मुक्त व्यापार क्षेत्र की स्थापना हेतु SCO सदस्य देशों ने बहुपक्षीय व्यापार एवं आर्थिक सहयोग हेतु 20 वर्ष के कार्यक्रम पर हस्ताक्षर किए।

SCO की विशेषताएँ

  • SCO में वैश्विक जनसंख्या का 40%, वैश्विक GDP का लगभग 20% तथा विश्व के कुल भू-भाग का 22% शामिल है।
  • अपने भौगोलिक महत्त्व के चलते SCO एशियाई क्षेत्र में रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करता है।
  • अपनी इस विशेषता के कारण SCO मध्य एशिया को नियंत्रित करने तथा क्षेत्र में अमेरिकी प्रभाव को सीमित करने में सक्षम है।
  • SCO को उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (NATO) के समकक्ष के रूप में भी जाना जाता है।

SCO के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ

  • SCO की सुरक्षा चुनौतियों में आतंकवाद, उग्रवाद तथा अलगाववाद का मुकाबला करना; मादक पदार्थों तथा हथियारों की तस्करी को रोकना एवं अवैध आप्रवासन की रोकथाम करना इत्यादि शामिल हैं।
  • भौगोलिक रूप से निकटता होते हुए भी संगठन के सदस्यों के इतिहास, पृष्ठभूमि, भाषा, राष्ट्रीय हितों एवं सरकार, संपन्नता व संस्कृति के रूप में समृद्ध विविधता SCO के निर्णयों लेने की प्रक्रिया को चुनौतीपूर्ण बनाते है।

भारत के लिये SCO का महत्त्व

  • SCO को इस समय दुनिया का सबसे बड़ा क्षेत्रीय संगठन माना जाता है और इसमें चीन तथा रूस के बाद भारत तीसरा सबसे बड़ा देश है। इस संगठन में शामिल होने से भारत का अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व बढ़ा है।
  • भारतीय हितों की जो चुनौतियाँ हैं, चाहे वे आतंकवाद से जुड़ी हों, ऊर्जा की आपूर्ति हो या प्रवासियों का मुद्दा...ये सभी मुद्दे भारत और SCO दोनों के लिए अहम हैं और ऐसे में भारत के इस संगठन से जुड़ने से दोनों को परस्पर लाभ होगा।
  • SCO की सदस्यता मिलने के साथ ही अब भारत को एक बड़ा वैश्विक मंच मिल गया है। SCO यूरेशिया का एक ऐसा राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संगठन है जिसका केंद्र मध्य एशिया और इसका पड़ोस है। ऐसे में इस संगठन की सदस्यता भारत के लिए कई मौके उपलब्ध करवाने वाली साबित हो सकती है।
  • चूँकि चीन SCO के माध्यम से क्षेत्र में अपने रणनीतिक हितों को पूरा करना चाहता है तो भारत भी इस स्थिति का लाभ उठाते हुए पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद पर लगाम लगाने के लिए चीन का सहयोग मांग सकता है, जैसा उसने हाल ही में अज़हर मसूद के मामले में किया और उसे अंतर्राष्ट्रीय आतंकी घोषित करवाया।
  • मध्य एशिया के देश जो प्राकृतिक गैस-तेल भंडार के मामले में धनी हैं, उनके साथ संबंधों को विस्तार देने में SCO भारत के लिए एक अच्छा ज़रिया बन सकता सकता है। भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने और रूस व यूरोप तक व्यापार के ज़मीनी मार्ग खोलने के लिये इस मंच का इस्तेमाल करना चाहिये। 
  • भारत के लिये SCO की सदस्यता क्षेत्रीय एकीकरण, सीमाओं के पार संपर्क एवं स्थिरता को बढ़ावा देने में सहायता प्रदान कर सकती है।
  • SCO की क्षेत्रीय आतंकवाद-रोधी संरचना (RATS) के माध्यम से भारत गुप्त सूचनाएँ साझा करने, कानून प्रवर्तन और सर्वोत्तम प्रथाओं अथवा प्रौद्योगिकियों के विकास की दिशा में कार्य कर अपनी आतंकवाद विरोधी क्षमताओं में सुधार कर सकता है।
  • SCO के माध्यम से भारत मादक पदार्थों की तस्करी तथा छोटे हथियारों के प्रसार पर भी रोक लगाने का प्रयास कर सकता है।
  • आतंकवाद एवं कट्टरतावाद की सामान्य चुनौतियों को लेकर साझा प्रयास किये जा सकते हैं।
  • लंबे समय से अटकी हुई तापी (तुर्कमेनिस्तान-अफग़ानिस्तान-पाकिस्तान-भारत) पाइपलाइन जैसी परियोजनाओं पर काम शुरू करने में तथा IPI (ईरान-पाकिस्तान-भारत) पाइपलाइन को SCO के माध्यम से सहायता मिल सकती है।
  • भारत तथा मध्य एशिया के बीच व्यापार में आने वाली प्रमुख बाधाओं को दूर करने के लिये SCO सहायता कर सकता है, क्योंकि यह मध्य एशिया के लिए एक वैकल्पिक मार्ग के रूप में कार्य करता है।
  • SCO के माध्यम से सदस्य देशों के साथ अपने आर्थिक संबंधों का विस्तार करते हुए भारत को मध्य एशियाई देशों के साथ सूचना प्रौद्योगिकी, दूरसंचार, बैंकिंग, वित्तीय तथा फार्मा उद्योगों हेतु एक विशाल बाज़ार मिल सकता है।
  • सावधानी से इस मंच का इस्तेमाल करते हुए भारत अपने इस विस्तारित पड़ोस (मध्य एशिया) में सक्रिय भूमिका निभा सकता है तथा साथ ही यूरेशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव को कम करने का प्रयास भी कर सकता है।
  • सबसे बड़ी बात यह कि SCO भारत को अपने पुराने तथा विश्वसनीय मित्र रूस के साथ अपने चीन और पाकिस्तान जैसे चिर प्रतिद्वंद्वियों के साथ जुड़ने के लिए एक साझा मंच प्रदान करता है।

SCO में भारत के लिये चुनौतियाँ

पाकिस्तान भी SCO का सदस्य है और वह भारत की राह में दुश्वारियाँ तथा कठिनाइयों का कारण लगातार बनता है। ऐसे में भारत की स्वयं को मुखर तौर पर पेश करने की क्षमता प्रभावित होगी। इसके अलावा चीन एवं रूस के SCO के सह-संस्थापक होने और इसमें इन देशों की प्रभावी भूमिका होने की वज़ह से भारत को अपनी स्थिति मज़बूत बनाने में कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है। साथ ही SCO का रुख परंपरागत रूप से पश्चिम विरोधी है, जिसकी वज़ह से भारत को पश्चिम देशों के साथ अपनी बढ़ती साझेदारी में संतुलन कायम करना होगा।

SCO के लिये नए मौके और चुनौतियाँ

2001 में अपनी स्थापना के बाद से 2017 में भारत और पाकिस्तान को SCO में शामिल करना इसका पहला विस्तार था। दरअसल, SCO एक नए तरह का क्षेत्रीय संगठन है जो शीतयुद्ध के बाद के काल में सुरक्षा, अर्थशास्त्र, राजनीति और संस्कृति जैसे क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा देता है। शंघाई विचारधारा द्वारा मार्गदर्शित “आपसी विश्वास, आपसी लाभ, समानता, परामर्श, विभिन्न सभ्यताओं के लिए सम्मान और साझा विकास” की तलाश में SCO एक आदर्श का पालन करता है। इसके तहत खुलेपन को बढ़ावा देते हुए न तो किसी प्रकार संधिकी जाती है और न ही किसी देश या क्षेत्र के अंदरूनी मामलों में दखलंदाज़ी की जाती है। यही कारण है कि इसने सदस्य देशों के बीच एक नए तरह का संबंध और क्षेत्रीय सहयोग स्थापित किया है। इसमें स्थायी शांति और मैत्री, अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के लिये सुरक्षा की नई संकल्पनाएँ पेश करना, सहयोग और कूटनीति समाहित है, जो पुरानी हो चुकी शीतयुद्ध की मानसकिता के बिलकुल विपरीत है तथा अंतर्राष्ट्रीय सिद्धांतों और प्रथाओं को समृद्ध बनाने वाली है।
SCO का सदस्य बन जाने से यदि भारत और चीन के आपसी तालमेल में बढ़ोतरी होती है तो अमेरिका के वैश्विक दबदबे का सामना करने के लिये यह दोनों ही देशों के लिए लाभकारी सिद्ध होगा तथा एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अपना वर्चस्व कायम करना अमेरिका के लिये आसान नहीं होगा।

Wednesday, May 8, 2019

विश्व बौद्धिक संपदा संगठन (WIPO)

Ashok Pradhan     May 08, 2019     No comments

  • WIPO का पूरा नाम World Intellectual Property Organization यानी विश्व बौद्धिक संपदा संगठन है।
  • यह संयुक्त राष्ट्र की सबसे पुरानी एजेंसियों में से एक है।
  • इसका गठन 1967 में रचनात्मक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने और विश्व में बौद्धिक संपदा संरक्षण को बढ़ावा देने के लिये किया गया था।
  • इसके तहत वर्तमान में 26 अंतर्राष्ट्रीय संधियाँ आती हैं।
  • WIPO का मुख्यालय जिनेवा, स्विट्ज़रलैंड में है।
  • प्रत्येक वर्ष 26 अप्रैल को विश्व बौद्धिक संपदा दिवस मनाया जाता है।
  • अभी 191 देश इसके सदस्य हैं, जिनमें संयुक्त राष्ट्र के 188 सदस्य देशों के अलावा कुक द्वीपसमूह, होली सी और न्यूए (Niue) शामिल हैं।
  • संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देश इसके सदस्य बन सकते हैं, लेकिन यह बाध्यकारी नहीं है।
  • फिलिस्तीन को इसमें स्थायी पर्यवेक्षक का दर्जा मिला हुआ है तथा लगभग 250 NGO और अंतर-सरकारी संगठन इसकी बैठकों में बतौर आधिकारिक पर्यवेक्षक शामिल होते हैं।
  • भारत 1975 में WIPO का सदस्य बना था।

आइये, अब एक नज़र डालते हैं इस संगठन के अब तक के सफर पर...

  • औद्योगिक संपदा के संरक्षण के लिये पेरिस अभिसमय (1883): विभिन्न देशों में बौद्धिक कार्यों के संरक्षण के लिये पहला कदम, जिसमें ट्रेडमार्क, औद्योगिक डिज़ाइन आविष्कार के पेटेंट शामिल थे।
  • साहित्यिक और कलात्मक कार्यों के संरक्षण के लिये बर्न अभिसमय (1886): इसमें उपन्यास, लघु कथाएँ, नाटक, गाने, ओपेरा, संगीत, ड्राइंग, पेंटिंग, मूर्तिकला और वास्तुशिल्प कृतियाँ शामिल हैं।
  • मैड्रिड समझौता (1891): यहाँ से अंतर्राष्ट्रीय बौद्धिक संपदा फाइलिंग सेवा की शुरुआत हुई।
  • BIRPI की स्थापना (1893): बौद्धिक संपदा संरक्षण हेतु पेरिस और बर्न अभिसमय पर अमल करने के लिये बनाए गए दो सचिवालयों को मिलाकर BIRPI (United International Bureaux for the Protection of Intellectual Property) की स्थापना हुई।
  • BIRPI बना WIPO (1970): सदस्य देशों का नेतृत्व करने वाले एक अंतर-सरकारी संगठन के रूप में WIPO की स्थापना की गई।
  • UN में शामिल हुआ WIPO (1974): WIPO ने वर्ष 1974 से संयुक्त राष्ट्र की एक एजेंसी के तौर पर काम करना शुरू किया।
  • पेटेंट कोऑपरेशन ट्रीटी सिस्टम की शुरुआत (1978):इस संधि के तहत एक अंतर्राष्ट्रीय पेटेंट आवेदन दाखिल कर एक साथ कई देशों में आविष्कार के संरक्षण का प्रयास किया जा सकता है।
  • मध्यस्थता केंद्र की स्थापना (1994): यह केंद्र निजी पक्षों के बीच अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक विवादों को हल करने में सहायता के लिये वैकल्पिक विवाद समाधान सेवाएँ प्रदान करता है।

WIPO के कार्य

  • हर पल बदलती दुनिया में संतुलित अंतर्राष्ट्रीय बौद्धिक संपदा नियमों को बनाने के लिये यह एक नीतिगत मंच का काम करता है।
  • विभिन्न देशों की सीमाओं के पार बौद्धिक संपदा संरक्षण और विवादों को हल करने के लिये वैश्विक सेवाएँ देना भी इसके कार्यों में शामिल है।
  • बौद्धिक संपदा प्रणालियों को आपस में जोड़ने और ज्ञान साझा करने के लिये तकनीकी आधारभूत संरचना बनाना भी WIPO के ज़िम्मे है।
  • सभी सदस्य देशों को आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास के लिये बौद्धिक संपदा का उपयोग करने में सक्षम बनाने के लिये सहयोग और क्षमता निर्माण कार्यक्रम चलाना।
  • WIPO बौद्धिक संपदा की जानकारी के लिये विश्वसनीय वैश्विक संदर्भ स्रोत का काम करता है।

अब चर्चा WIPO की सीमाओं और अपवादों की...

सीमा और अपवाद को WIPO के एजेंडे का एक मुद्दा माना जाता है, क्योंकि अधिकार धारकों और संरक्षित कार्यों का उपयोग करने वालों के हितों के बीच उचित संतुलन बनाए रखने के लिये कॉपीराइट कानून आर्थिक अधिकारों पर कुछ प्रतिबंध लगाते हैं। प्रायः ये ऐसे मामले होते हैं जिनमें संरक्षित कार्यों का उपयोग अधिकार धारकों की अनुमति के बिना और मुआवज़े का भुगतान करके या न करके किया जा सकता है। देखा यह गया है कि सीमाओं और अपवादों के संबंध में बहस मुख्य रूप से तीन समूहों के लाभार्थियों या गतिविधियों पर केंद्रित रहती है- इसमें 1. शैक्षणिक गतिविधियों 2. पुस्तकालयों और अभिलेखागारों 3. विकलांग व्यक्तियों, विशेषकर दृष्टिबाधितों को शामिल किया गया है।

विश्व बैंक समूह

Ashok Pradhan     May 08, 2019     No comments

विश्व बैंक समूह से जुड़ी सामान्य जानकारी


अंतर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण और विकास बैंक (International Bank for Reconstruction and Development-IBRD) और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (International Monetary Fund-IMF) की स्थापना एक साथ वर्ष 1944 में अमेरिका के न्यू हैम्पशायर में ब्रेटन वुड्स सम्मेलन (Bretton Woods Conference) के दौरान हुई थी। ब्रेटन वुड्स सम्मेलन को आधिकारिक तौर पर संयुक्त राष्ट्र मौद्रिक और वित्तीय सम्मेलन (United Nations Monetary and Financial Conference) के रूप में जाना जाता है। 1 से 22 जुलाई, 1944 तक 44 देशों के प्रतिनिधि इस सम्मलेन में शामिल हुए थे। इसका तात्कालिक उद्देश्य द्वितीय विश्वयुद्ध और विश्वव्यापी संकट से जूझ रहे देशों की मदद करना था।
  • अंतर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण और विकास बैंक को ही विश्व बैंक कहा जाता है।
  • इसका मुख्यालय अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन DC (पूर्व में District of Colombia) में है।
  • विश्व बैंक संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी एक अहम संस्था है और यह कई संस्थाओं का समूह है। इसीलिये इसे विश्व बैंक समूह (World Bank Group) भी कहा जाता है।
  • वर्तमान में विश्व बैंक में 189 देश सदस्य हैं। विश्व बैंक का सदस्य बनने के लिये किसी भी देश को पहले अंतर्राष्ट्रीय वित्त निगम का सदस्य बनना ज़रूरी होता है।

दोनों में अंतर

विश्व बैंक नीति सुधार कार्यक्रमों और परियोजनाओं के लिये ऋण देता है, जबकि अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष केवल नीति सुधार कार्यक्रमों के लिये ही ऋण देता है। इन दोनों संस्थाओं में एक अंतर यह भी है कि विश्व बैंक केवल विकासशील देशों को ऋण देता है, जबकि अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के संसाधनों का इस्तेमाल निर्धन राष्ट्रों के साथ-साथ धनी देश भी कर सकते हैं।
  • इसका मुख्य उद्देश्य सदस्य राष्ट्रों को पुनर्निमाण और विकास के कार्यों में आर्थिक सहायता देना है।
  • यह एक अग्रणी विकास संस्थान है, जो विकासशील देशों में गरीबी से लड़ने तथा सतत् विकास को बढ़ावा देने के लिये ऋण, गारंटी, जोखिम प्रबंधन उत्पादों और विश्लेषणात्मक तथा सलाहकार सेवाएँ देने का काम करता है।
  • इसके सदस्य देश संयुक्त रूप से इसकेलिये ज़िम्मेदार होते हैं कि कैसे इसका वित्तपोषण किया जाता है और इसका पैसा कैसे खर्च किया जाता है।
  • विश्व बैंक का प्रयास सतत गरीबी में कमी के उद्देश्य से सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों तक पहुँचने पर केंद्रित हैं।

विश्व बैंक समूह में शामिल संस्थान

विश्व बैंक समूह निम्नलिखित पाँच अंतर्राष्ट्रीय संगठनों का एक ऐसा समूह है जो सदस्य देशों को आर्थिक-वित्तीय सहायता और वित्तीय सलाह देता है:
1. पुनर्निर्माण और विकास के लिये अंतर्राष्ट्रीय बैंक (International Bank for Reconstruction and Development-IBRD)
IBRD की स्थापना वर्ष 1945 में हुई थी और वर्तमान में इसके 188 सदस्य हैं। IBRD का उद्देश्य मध्यम विकास वाले देशों और ऋणग्रस्त गरीब देशों में ऋण, गारंटी और गैर-उधार सेवाओं के माध्यम से सतत् विकास को बढ़ावा देना है जिसमें विश्लेषणात्मक और सलाहकार सेवाएँ शामिल हैं। IBRD उन सदस्य देशों के स्वामित्व में है जिनकी मतदान शक्ति देश की सापेक्ष आर्थिक शक्ति के आधार पर इसकी पूंजी सदस्यता से जुड़ी हुई है। IBRD दुनिया के वित्तीय बाज़ारों से अपना अधिकांश धन जुटाता है और वर्ष 1959 से इसने AAA रेटिंग बनाए रखी है। IBRD और IDA मिलकर विश्व बैंक का स्वरूप लेते हैं, जो विकासशील देशों की सरकारों को वित्तपोषण, नीति सलाह और तकनीकी सहायता प्रदान करता है। यह विश्व बैंक के परिचालन खर्चों को वहन करता है तथा बेहद गरीब देशों के लिये IDA को धन प्रदान करता है।
2. अंतर्राष्ट्रीय वित्त निगम (International Finance Corporation-IFC)
वर्ष 1956 में स्थापित IFC 184 सदस्य देशों के स्वामित्व में है, जो सामूहिक रूप से नीतियों को निर्धारित करता है। यह 100 से अधिक विकासशील देशों में उभरते बाज़ारों में कंपनियों और वित्तीय संस्थानों को रोज़गार सृजित करने, कर राजस्व जुटाने, कॉर्पोरेट प्रशासन और पर्यावरण प्रदर्शन में सुधार करने तथा उनके स्थानीय समुदायों में योगदान करने में सहायता देता है। यह विकासशील देशों में विशेष रूप से निजी क्षेत्र पर केंद्रित सबसे बड़ा वैश्विक विकास संस्थान है। IFC अंतर्राष्ट्रीय पूंजी बाज़ार में ऋण दायित्वों को पूरा करने के माध्यम से लगभग सभी ऋण गतिविधियों के लिये धन जुटाता है। वर्ष 1989 के बाद से IFC ने अपनी AAA रेटिंग बनाए रखी है। यह आमतौर पर 7 से 12 साल की परिपक्वता वाले व्यवसायों और निजी परियोजनाओं को ऋण देता है। इसके द्वारा किये जाने वाले निवेशों के लिये समान ब्याज दर की नीति नहीं है। IFC अंतर्राष्ट्रीय लेन-देन के जोखिम को कम करने के लिये अपने वैश्विक व्यापार वित्त कार्यक्रम के माध्यम से 80 से अधिक देशों में 200 से अधिक अनुमोदित बैंकों के व्यापार भुगतान दायित्वों की गारंटी देता है।
3. अंतर्राष्ट्रीय विकास संघ (International Development Association-IDA)
IDA की स्थापना वर्ष 1960 में हुई थी और वर्तमान में इसके 173 देश सदस्य हैं। IDA विश्व बैंक का वह हिस्सा है जो दुनिया के सबसे गरीब देशों की मदद करता है। 173 शेयरधारक देशों द्वारा प्रबंधित IDA का उद्देश्य आर्थिक विकास को बढ़ावा देना, असमानताओं को कम करना और लोगों की जीवन स्थितियों में सुधार के लिये अनुदान प्रदान करना है। यह दुनिया के 75 सबसे गरीब देशों में बुनियादी सामाजिक सेवाओं हेतु सहायता प्रदान करने वाले सबसे बड़े स्रोतों में से एक है, इनमें से 39 अफ्रीका में हैं। IDA रियायती शर्तों पर ऋण देता है अर्थात यह शून्य या बहुत कम ब्याज शुल्क लेता है और पुनर्भुगतान 30 से 38 वर्ष तक किया जा सकता है, जिसमें 5 से 10 साल की छूट अवधि भी शामिल है। यह समानता, आर्थिक विकास, रोज़गार सृजन, उच्च आय और बेहतर जीवन स्थितियों का समर्थन करते हुए सहायता प्रदान करता है। प्राथमिक शिक्षा, बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं, स्वच्छता और स्वच्छ पानी, कृषि, व्यापार जलवायु सुधार, बुनियादी ढाँचा और संस्थागत सुधारों के लिये भी IDA सहायता करता है।
4. निवेश विवादों के निपटारे के लिये अंतर्राष्ट्रीय केंद्र (International Centre for Settlement of Investment Disputes-ICSID)
वर्ष 1966 में स्थापित ICSID एक स्वायत्त अंतर्राष्ट्रीय संस्था है। ICSID अभिसमय एक बहुपक्षीय संधि है जिसे विश्व बैंक के कार्यकारी निदेशकों द्वारा तैयार किया गया है ताकि बैंक के निवेश को बढ़ावा देने के उद्देश्य को आगे बढ़ाया जा सके। इसका प्राथमिक उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय निवेश विवादों के सुलह और मध्यस्थता के लिये सुविधाएँ प्रदान करना है। अधिकांश देशों ने अंतर्राष्ट्रीय निवेश संधियों और कई निवेश कानूनों और अनुबंधों में निवेशक-राज्य विवाद निपटान के लिये एक मंच के रूप में ICSID को मान्यता दी है। इसका नेतृत्व महासचिव द्वारा किया जाता है जो कार्यवाही के लिये तकनीकी और प्रशासनिक सहायता प्रदान करता है। इसके महासचिव को पंचाट न्यायाधिकरण या सुलह आयोग का गठन करने का अधिकार है। अधिकांश मामलों में न्यायाधिकरण में तीन मध्यस्थ होते हैं: निवेशक द्वारा नियुक्त, राज्य द्वारा नियुक्त और दोनों पक्षों के समझौते द्वारा नियुक्त।
5. बहुपक्षीय निवेश गारंटी एजेंसी (Multilateral Investment Guarantee Agency-MIGA)
12 अप्रैल, 1988 को विश्व बैंक समूह के नए सदस्य के रूप में MIGA की स्थापना की गई। कानूनी तौर पर अलग और आर्थिक रूप से स्वतंत्र इकाई के रूप में व्यवसाय के लिये खोली गई MIGA में 179 देश सदस्य हैं। MIGA को विकासशील देशों में गैर-वाणिज्यिक जोखिमों के खिलाफ निवेश बीमा के सार्वजनिक और निजी स्रोतों के पूरक के लिये बनाया गया था। यह ऋणदाताओं और निवेशकों को युद्ध जैसे राजनीतिक जोखिम के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करने का काम करती है। इसका उद्देश्य विकासशील देशों में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश को बढ़ावा देना है ताकि आर्थिक विकास में मदद मिल सके, गरीबी को कम किया जा सके और लोगों के जीवन को बेहतर बनाया जा सके। MIGA का गठन विकासशील देशों में गैर-वाणिज्यिक जोखिमों के खिलाफ निवेश और बीमा के सार्वजनिक और निजी स्रोतों के पूरक के तौर पर किया गया था। इन जोखिमों में मुद्रा की अनिश्चितता और हस्तांतरण प्रतिबंध; सरकार का विघटन; युद्ध, आतंकवाद और नागरिक गड़बड़ी; अनुबंध का उल्लंघन तथा वित्तीय दायित्वों के निर्वहन से भटकाव की स्थिति आदि शामिल हैं।

विश्वबैंक का कार्यकारी निदेशक मंडल

विश्व बैंक समूह के चार संस्थानों का प्रतिनिधित्व करने वाले कार्यकारी निदेशकों के चार बोर्ड हैं: इंटरनेशनल बैंक फॉर रिकंस्ट्रक्शन एंड डेवलपमेंट (IBRD), अंतर्राष्ट्रीय विकास एजेंसी (IDA), अंतर्राष्ट्रीय वित्त निगम (IFC) और बहुपक्षीय निवेश गारंटी एजेंसी (MIGA)।
  • इन बोर्डों में काम करने वाले कार्यकारी निदेशक आमतौर पर समान होते हैं।
  • कार्यकारी निदेशकों के ये बोर्ड विश्व बैंक समूह के सामान्य संचालन के लिये ज़िम्मेदार हैं और सदस्यों का प्रतिनिधित्व बोर्ड ऑफ गवर्नर्स द्वारा किया जाता है।
  • बोर्ड ऑफ गवर्नर्स उन्हें सौंपी गई सभी शक्तियों का उपयोग करते हैं।
  • इन बोर्ड्स में 24 कार्यकारी निदेशक होते हैं और एक अध्यक्ष होता है।
  • हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के अधिकारी डेविड मालपास को विश्व बैंक के 13वें अध्यक्ष के तौर पर चुना गया।
  • विश्व बैंक के कार्यकारी बोर्ड ने आम सहमति से उनका चयन किया। 
  • विश्व बैंक का सबसे बड़ा शेयरधारक इसके अध्यक्ष का नाम प्रस्तावित करता है।
  • अमेरिका विश्व बैंक का सबसे बड़ा शेयरधारक है और यही कारण है कि अब तक इसके सभी अध्यक्ष अमेरिकी ही रहे हैं।

विश्व बैंक समूह की सदस्यता

  • IBRD के आर्टिकल्स ऑफ एग्रीमेंट के तहत बैंक का सदस्य बनने के लिये किसी देश को पहले अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) में शामिल होना अनिवार्य है।
  • IBRD की सदस्यता मिलने पर ही IDA, IFC और MIGA की सदस्यता मिलती है।
  • ICSID में सदस्यता IBRD के सदस्यों के लिये उपलब्ध होती है, किंतु जो IBRD के सदस्य नहीं हैं, लेकिन पार्टी ऑफ इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस (ICJ) के सदस्य हैं, उन्हें ICSID प्रशासनिक परिषद के आमंत्रण पर अपने सदस्यों के दो-तिहाई वोट का समर्थन मिलने पर ही सदस्यता दी जाती है।

विश्व बैंक समूह और भारत

  • भारत ब्रेटन वुड्स में किये गए समझौतों के मूल हस्ताक्षरकर्त्ताओं में से एक था, जिसने इंटरनेशनल बैंक फॉर रिकंस्ट्रक्शन एंड डेवलपमेंट (IBRD) और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF)) की स्थापना की।
  • भारत वर्ष 1956 में IFC और 1960 में IDA के संस्थापक सदस्यों में भी शामिल था।
  • भारत जनवरी वर्ष 1994 में MIGA का सदस्य बना।
भारत ICSID का सदस्य नहीं है। इसके पीछे भारत का यह तर्क है कि ICSID कन्वेंशन निष्पक्ष नहीं है और इसके नियम विकसित देशों के पक्ष में झुके हुए हैं। ICSID में केंद्रीय अध्यक्ष विश्व बैंक का अध्यक्ष होता है। अध्यक्ष मध्यस्थों की नियुक्ति करता है। यदि मध्यस्थता से जुड़े निर्णय संतोषजनक नहीं होते है, तो असंतुष्ट पक्ष एक पैनल से अपील करता है जिसे ICSID ​​द्वारा ही गठित किया जाता है। इसमें भारतीय अदालतों द्वारा निर्णय की समीक्षा किये जाने की कोई गुंजाइश नहीं होती है, भले ही उसका यह निर्णय (Award) सार्वजनिक हित के विरुद्ध हो।
  • वर्ष 1949 में भारतीय रेल को ऋण देने के साथ IBRD द्वारा भारत को ऋण देने की शुरुआत हुई तथा वर्ष 1959 में भारत में IFC और वर्ष 1961 में IDA द्वारा पहला निवेश एक राजमार्ग निर्माण परियोजना पर किया गया।
  • 1950 के दशक के दौरान भारत हेतु विश्व बैंक के ऋण का एकमात्र स्रोत IBRD था। दशक के अंत तक भारत की बढ़ती ऋण समस्या विश्व बैंक समूह के सॉफ्ट लोन से जुड़े IDA के लॉन्च में एक महत्त्वपूर्ण कारक बनी।
  • 1960 के दशक के अंत में अमेरिका ने अपने द्विपक्षीय सहायता कार्यक्रम में तेज़ी से कटौती की, जो उस समय भारत के बाहरी संसाधनों का सबसे बड़ा स्रोत था। तब से ही विश्व बैंक आधिकारिक तौर पर दीर्घकालिक वित्त के सबसे महत्त्वपूर्ण स्रोत के रूप में उभरा।
  • 1960 और 1970 के दशक के दौरान IDA ने विश्व बैंक द्वारा दिये गए कुल ऋण का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा भारत को दिया। इस प्रकार IDA से अब तक का सबसे बड़ा ऋण प्राप्तकर्ता भारत बना और यह राशि कुल दिये गए सभी ऋणों के 2/5 हिस्से के बराबर थी।
  • चीन वर्ष 1980 में विश्व बैंक में शामिल हुआ और उसने सीमित IDA संसाधनों पर अपनी दावेदारी भी जताई।
  • अफ्रीका के बिगड़ते आर्थिक हालात और भारतीय अर्थव्यवस्था के बेहतर प्रदर्शन से IDA में भारत की ऋण हिस्सेदारी तेज़ी से कम होने लगी।
  • 1980 के दशक के दौरान विश्व बैंक ने नीतियों में सुधार और आर्थिक उदारीकरण पर ज़ोर दिया। यह भारत में बुरे दौर से गुज़र रहे सार्वजनिक संस्थानों को ऋण देता रहा और भारत की बंद अर्थव्यवस्था की आलोचना को लेकर मौन साधे रहा।
  • वर्ष 1991 के व्यापक आर्थिक संकट के बाद परिस्थितियों में तेज़ी से बदलाव आया। इसके बाद संरचनात्मक समायोजन कार्यक्रम (Structural Adjustment Program-SAP) के अंतर्गत ऋण देने के लिये विश्व बैंक के लिये भारत महत्त्वपूर्ण देश बन गया, क्योंकि उसने वित्त, कराधान और निवेश तथा बिज़नेस आदि क्षेत्रों में नीतिगत सुधारों के लिये सहमति जताई थी।
  • भारत को वर्तमान में मिश्रित देश के रूप में वर्गीकृत किया गया है और इसे निम्न मध्यम-आय से मध्यम-आय में जाने वाले देश के रूप में परिभाषित किया गया है तथा यह IDA और IBRD दोनों से ऋण लेने के लिये योग्य देश है।
  • विश्व बैंक के IBRD से सबसे अधिक ऋण लेने वाला देश भारत है। 2015 से 2018 के बीच विश्व बैंक ने भारत को लगभग $ 10.2 बिलियन का ऋण दिया है।
  • विश्व बैंक समूह ने 2019-22 की अवधि में भारत के लिये 25-30 बिलियन डॉलर की योजनाओं हेतु ऋण प्रतिबद्धताओं को मंज़ूरी दी है।

विश्व बैंक में सुधार

  • विश्व बैंक पर यह आरोप लगता रहा है कि यह अपने SAP के ज़रिये विश्व में पूंजीवाद के उद्देश्यों को पूरा करता है और इसमें अमीर देशों का वर्चस्व रहता है।
  • यह SAP ‘मुक्त बाज़ार’ हेतु आर्थिक नीति में सुधारों का एक समूह है जो विश्व बैंक द्वारा विकासशील देशों पर ऋण प्राप्ति की शर्त के रूप में लागू किया है।
  • यह तर्क दिया जाता है कि SAP नीतियों ने स्थानीय और वैश्विक दोनों ही स्थितियों में अमीर और गरीब के बीच की खाई को बढ़ाया है।
  • उभरती हुई नई आर्थिक शक्तियों, विशेष रूप से भारत और चीन तथा दुनिया के कुछ अन्य एशियाई एवं कुछ लैटिन अमेरिकी देशों को विश्व बैंक में उचित स्थान और भूमिका दी जानी चाहिये।
  • विश्व बैंक अपने आपको बदलती विश्व व्यवस्था के अनुकूल ढालने में विफल रहा है, इसीलिये तेज़ी से आगे बढ़ रही भारत और चीन जैसी अर्थव्यवस्थाओं ने एशिया इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक (AIIB) की स्थापना की है।
  • विश्व बैंक में सुधार वर्तमान विश्व व्यवस्था को पुनर्जीवित करने और बढ़ती शक्तियों और विकासशील देशों को इस संस्था में एक सार्थक आवाज़ देने के हिस्से के रूप में बेहद आवश्यक हैं।

भारत के भविष्य को लेकर विश्व बैंक का रुख

1.2 अरब की जनसंख्या और विश्व की पाँच सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक भारत की हाल की संवृद्धि तथा इसका विकास वर्तमान समय की अत्यंत उल्लेखनीय सफलताओं में से हैं। आज फार्मा, इस्पात, सूचना तथा अंतरिक्ष-संबंधी प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में भारत की पहचान विश्व-स्तर पर है तथा इसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक ऐसी आवाज़ माना जाता है, जो इसके विशाल आकार और संभावनाओं के अनुरूप है।
भारत में बड़े बदलाव आ रहे हैं, जिनसे इसके लिये 21वीं सदी का मज़बूत देश बनने के नए-नए अवसर पैदा हो रहे हैं। भारत विश्व का सबसे विशाल और अत्यंत युवा श्रमशक्ति वाला देश है। साथ ही देश में शहरीकरण की तीव्र प्रक्रिया चल रही है और प्रतिवर्ष लगभग 1 करोड़ लोग रोज़गार तथा अवसरों की तलाश में कस्बों और शहरों की ओर रुख कर रहे हैं। यह इस सदी का विशालतम ग्रामीण और शहरी प्रवासन है।
इन बदलावों की वज़ह से भारत एक ऐसे मोड़ पर पहुँच गया है, जहाँ यह देखना बेहद ज़रूरी होगा कि भारत अपनी श्रमशक्ति की उल्लेखनीय सामर्थ्य का विकास किस प्रकार करता है और अपने बढ़ते हुए शहरोंव कस्बों की संवृद्धि के लिये किस तरह की नई योजनाएँ तैयार करता है। इन्हीं सब बातों से आने वाले समय में देश और इसके निवासियों का भविष्य निर्धारित होगा।

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