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Tuesday, April 30, 2019

करेंसी वारः एक नवीन वैश्विक आर्थिक संघर्ष

Ashok Pradhan     April 30, 2019     No comments

करेंसी वार क्या है व इसकी पृष्ठभूमि?

  • विभिन्न अर्थव्यवस्थाओं द्वारा अपने निर्यात को बढ़ाने के लिये जानबूझकर अपनी मुद्राओं के मूल्य में कमी करना ही करेंसी वार कहलाता है। इस परिघटना को ‘प्रतिस्पर्द्धी अवमूल्यन’ (Competitive Devaluation) के रूप में भी जाना जाता है।
  • इस प्रतिस्पर्द्धी अवमूल्यन की वजह से विदेशी विनिमय की परिवर्तनशीलता नाटकीय ढंग से होती है, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और निवेश में एकाएक वृद्धि और गिरावट की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
  • विदेशी निवेशकों द्वारा बाजार से धन निकालने पर अर्थव्यवस्था में पूंजी प्रवाह का आकार सिकुड़ जाता है, जिसकी परिणति अर्थव्यवस्था पर अवस्फीतिकारी दबाव (deflationary pressure) के रूप में हो सकती है।
  • वर्तमान में हम लोग करेंसी वार के तीसरे दौर में प्रवेश कर चुके हैं। इससे पहले दो करेंसी वार हो चुके हैं।
  • पहला- यह 1921 से 1936 तक चला। प्रथम विश्व युद्ध से उपजी परिस्थितियों ने ब्रिटेन, फ्राँस, जर्मनी एवं अमेरिका जैसे देशों को अपनी मुद्रा का अवमूल्यन करने के लिये बाध्य किया जिसकी परिणति अनियंत्रित महँगाई अथवा मुद्रास्फीति के रूप में सामने आई।
  • दूसरा- 1971 में अमेरिकी राष्ट्रपति ने विदेशी केंद्रीय बैंकों द्वारा डॉलर की स्वर्ण में परिवर्तनीयता पर रोक लगा दी तथा सभी आयातों पर 10% का अतिरिक्त अधिभार आरोपित कर दिया।
वर्तमान करेंसी वार
  • नवंबर 2008 तक कई वित्तीय संस्थाओं के ढह जाने के बाद अमेरिकी फेडरल बैंक ने ‘क्वांटिटेटिव ईजिंग’ की नीति अपनाकर और ब्याज दरों को शून्य के करीब रखकर अमेरिकी अर्थव्यवस्था को निम्न विकास दर और उच्च बेरोज़गारी की स्थिति से बाहर निकालने का निर्णय लिया।
  • इस नीति से अमेरिकी अर्थव्यवस्था अवस्फीति से तो बाहर आ गई लेकिन डॉलर की तरलता में वृद्धि कर दी जिसकी वजह से भारत, इण्डोनेशिया और तुर्की जैसे दुनिया के उभरते हुए बाजारों में पूंजी प्रवाह की मात्र काफी बढ़ गई जिसकी परिणति मुद्रास्फीति डॉलर के अधिमूल्यन तथा डॉलर के सापेक्ष अन्य उभरते हुए बाजारों की मुद्राओं की प्रतिस्पर्द्धी क्षमता में कमी के रूप में सामने आई।
  • इसी राह पर चलते हुए यूरोपियन सेन्ट्रल बैंक ने यूरो-जोन संकट से निपटने के लिये 2016 के अंत तक ‘क्वांटिटेटिव ईजिंग’ की नीति अपनाने का निर्णय लिया।
युआन का अवमूल्यन तथा भावीचुनौतियाँ
  • युआन का अवमूल्यन एक ऐसे संक्रमण को इंगित करता है जिसमें वैश्विक अर्थव्यवस्था एक उदार विनिमय दर से अधिकाधिक बाजार आधारित विनिमय दर की ओर उन्मुख है।
  • चीन का ऋण भार उसके जी.डी.पी. अनुपात की तुलना में बहुत अधिक है। साथ ही वस्तुओं और कच्चे तेल की कीमतों में हुई शुद्ध गिरावट की तुलना में उसका आयात बिल भी लगातार कम हो रहा है। इसी वजह से चीन युआन का अवमूल्यन करने के लिये प्रेरित हुआ।
  • एक स्थिर विनिमय दर को बनाए रखने के क्रम में चीन अपने विदेशी मुद्रा भंडार का एक बड़ा हिस्सा अमेरिकी ट्रेजरी बॉण्ड में निवेश कर रहा है। साथ ही, चीन अपने विदेशी मुद्रा भंडार को एशियाई अवसंरचना निवेश बैंक में भी लगाना चाहता है ताकि कम-से-कम पूर्वी एशिया में वह स्पष्ट रूप से ‘डॉलर जोन’ को ‘रेन्मिन्बी जोन’ से प्रतिस्थापित कर सके।
  • चीन अन्य एशियाई मुद्राओं (जो युआन जितनी मजबूत नहीं हैं) से यह अपेक्षा रखता है कि वे प्रतिस्पर्द्धी अवमूल्यन की नीति अपनाएँ जिससे अंततः युआन उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं तथा डॉलर की तुलना में विजेता बनकर उभरे।
करेंसी वार से उत्पन्न समस्याएँ
  • करेंसी वार से विभिन्न देशों के बीच डंपिंग तथा आयात शुल्कों एवं काउंटर वेलिंग शुल्कों में वृद्धि हुई है।
  • जिन देशों के पास सीमित मात्र में संसाधन होते हैं, वे मजबूत निर्यात प्रधान अर्थव्यवस्थाओं पर निर्भर हो जाते हैं। ऐसे में इन देशों की कमजोर मुद्रा आयात लागत को बढ़ा देती है, वहीं मुद्रा को कमजोर बनाए रखना भी मुश्किल हो जाता है क्योंकि इसकी वजह से बाजार में तरलता बढ़ने से मुद्रास्फीति भी बढ़ जाती है।
इस संदर्भ में भारत की रणनीति क्या होनी चाहिये?
चीन की नीति का अनुसरण और ‘प्रतिस्पर्द्धी अवमूल्यन’ जैसा कोई भी कदम भारतीय अर्थव्यवस्था के लिये निरर्थक ही होगा क्योंकि कठोर व्यापार नीतियों, प्रशुल्क और गैर-प्रशुल्कीय बाधाओं की वजह से इस तरह के अवमूल्यन का प्रभाव अंततः नगण्य ही हो जाएगा।
पिछले एक साल के आँकड़े दर्शाते हैं कि भारतीय रुपये में खास उतार-चढ़ाव नहीं देखा गया तथा बाजार आधारित विनिमय दर के आधार पर विश्व जी.डी.पी. में भारत का योगदान भी सतत् बना रहा है। इसके अलावा चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा भी एक चिंता का विषय बना हुआ है। ऐसे में कोई भी अव्यावहारिक करेंसी वार किसी अन्य देश की तुलना में भारत की व्यापार स्थिति के लिये अधिक मुसीबतें खड़ी कर सकता है।

सतत् विकास लक्ष्य

Ashok Pradhan     April 30, 2019     No comments

भूमिका

वर्ष 2015 में संयुक्त राष्ट्र महासभा की 70वीं बैठक में ‘2030 सतत् विकास हेतु एजेंडा’ के तहत सदस्य देशों द्वारा 17 विकास लक्ष्य अर्थात् एसडीजी (Sustainable Development goals-SDGs) तथा 169 प्रयोजन अंगीकृत किये गए हैं।
क्या है सतत् विकास?
‘पर्यावरण तथा विकास पर विश्व आयोग’ (1983) के अंतर्गत बर्टलैंड कमीशन द्वारा जारी रिपोर्ट (1987) के अनुसार–‘आने वाली पीढ़ी की अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता से समझौता किये बिना वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करने हेतु विकास ही सतत् विकास है।’
SDGs क्यों?
MDGs (Millennium Development Goals) की अवधि 2015 में खत्म हो गई। पर्यावरण सुरक्षा के साथ मानव विकास हेतु।
संयुक्त राष्ट्र का एजेंडा 2030 (17 विकास लक्ष्य)
  • गरीबी के सभी रूपों की पूरे विश्व से समाप्ति।
  • भूख की समाप्ति, खाद्य सुरक्षा और बेहतर पोषण और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा।
  • सभी आयु के लोगों में स्वास्थ्य, सुरक्षा और स्वस्थ जीवन को बढ़ावा।
  • समावेशी और न्यायसंगत गुणवत्तायुक्त शिक्षा सुनिश्चित करने के साथ ही सभी को सीखने का अवसर देना।
  • लैंगिक समानता प्राप्त करने के साथ ही महिलाओं और लड़कियों को सशक्त करना।
  • सभी के लिये स्वच्छता और पानी के सतत् प्रबंधन की उपलब्धता सुनिश्चित करना।
  • सस्ती, विश्वसनीय, टिकाऊ और आधुनिक ऊर्जा तक पहुँच सुनिश्चित करना।
  • सभी के लिये निरंतर समावेशी और सतत् आर्थिक विकास, पूर्ण और उत्पादक रोज़गार तथा बेहतर कार्य को बढ़ावा देना।
  • लचीले बुनियादी ढाँचे, समावेशी और सतत् औद्योगीकरण को बढ़ावा।
  • देशों के बीच और भीतर असमानता को कम करना।
  • सुरक्षित, लचीले और टिकाऊ शहर और मानव बस्तियों का निर्माण।
  • स्थायी खपत और उत्पादन पैटर्न को सुनिश्चित करना।
  • जलवायु परिवर्तन और उसके प्रभावों से निपटने के लिये तत्काल कार्रवाई करना।
  • स्थायी सतत् विकास के लिये महासागरों, समुद्रों और समुद्री संसाधनों का संरक्षण और उपयोग।
  • सतत् उपयोग को बढ़ावा देने वाले स्थलीय पारिस्थितिकीय प्रणालियों, सुरक्षित जंगलों, भूमि क्षरण और जैव-विविधता के बढ़ते नुकसान को रोकने का प्रयास करना।
  • सतत् विकास के लिये शांतिपूर्ण और समावेशी समितियों को बढ़ावा देने के साथ ही साथ सभी स्तरों पर इन्हें प्रभावी, जवाबदेहपूर्ण बनाना ताकि सभी के लिये न्याय सुनिश्चित हो सके।
  • सतत् विकास के लिये वैश्विक भागीदारी को पुनर्जीवित करने के अतिरिक्त कार्यान्वयन के साधनों को मजबूत बनाना।
क्या थे MDGs (Millennium Development Goals)?
  • ये संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा वर्ष 2000 में फ्रेम को स्वीकार किया गया था।
  • लेकिन लक्ष्यों की 1990 के स्तर पर गणना की गई।
  • ये 2015 तक के लिये थे।
  • इसके अंतर्गत 8 गोल तथा 18 टारगेट्स रखे गए थे।
यूएनडीपी की भूमिका
  • SDG1 जनवरी, 2016 से प्रभाव में आ गए तथा यूएनडीपी की निगरानी व संरक्षण में ये अगले 15 सालों तक प्रभावी रहेंगे। संयुक्त राष्ट्र की प्रमुख SDG, लक्ष्य प्राप्ति कार्य करने वाली संस्था यूएनडीपी विश्व के 170 देशों में इन लक्ष्यों की प्राप्ति पर नजर रखेगी।
  • यूएनडीपी का प्रमुख लक्ष्य इन देशों में गरीबी को खत्म करना, लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था को प्रोत्साहन, पर्यावरण परिवर्तन और आपदा परिवर्तन पर कार्य तथा आर्थिक समानता प्राप्ति आदि पर ज्यादातर केंद्रित रहेगा।
  • SDGs, लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये सरकारी, निजी क्षेत्र, नागरिक समाज तथा सभी लोगों को आपसी सहयोग से काम करना होगा।
निष्कर्ष
सतत् विकास लक्ष्यों का मुख्य उद्देश्य विश्व से गरीबी को पूर्णतः खत्म करना तथा सभी समाजों में सामाजिक न्याय व पूर्ण समानता स्थापित करना है। भारत को भी गंभीरता से इन लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु कार्य करना चाहिये।

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