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Wednesday, May 8, 2019

एक भारत श्रेष्ठ भारतः राष्ट्रीय एकता की दिशा में एक मज़बूत पहल

Ashok Pradhan     May 08, 2019     No comments

चर्चा में क्यों?

एक वार्षिक कार्यक्रम के रूप में विभिन्न राज्यों को सांस्कृतिक एकता के सूत्र में पिरोने के उद्देश्य से ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ अभियान शुरू किया जाएगा। इस कार्यक्रम के तहत प्रत्येक वर्ष कोई एक राज्य अपनी संस्कृति एवं पर्यटन के प्रचार-प्रसार के लिये किसी अन्य राज्य को चुनेगा तथा दोनों राज्यों के मध्य विभिन्न माध्यमों द्वारा अंतःक्रिया बढ़ाई जाएगी।

सरकार की मंशा

सरकार की इस पहल का मूल उद्देश्य, देश में आंतरिक रूप से व्याप्त सांस्कृतिक अंतर को पाटकर विभिन्न राज्यों के लोगों के बीच आपसी अंतःक्रिया को बढ़ावा देना है, जो अंततः राष्ट्र की मजबूती व एकता का महत्त्वपूर्ण कारक बनेगी। साथ ही इससे भारतीय शासन व्यवस्था के संघात्मक ढाँचे को भी बल प्राप्त होगा। इससे आंतरिक संघर्षों को रोकने तथा देश में व्याप्त अंतर्विरोधी तत्त्वों के आपसी टकराव को रोकने में मदद मिलेगी।

पश्चिमी राष्ट्र संकल्पना

सामान्यतः पश्चिमी विचारकों ने राष्ट्र की जो संकल्पना प्रस्तुत की उसमें एकसमान भाषा, जाति (नस्ल) और धर्म को राष्ट्र निर्माण का आधार बताया गया है और ये कहा गया कि इसके अभाव में बने किसी भी राष्ट्र का अस्तित्व टिकाऊ नहीं हो सकता।

भारतीय राष्ट्र संकल्पना एवं पश्चिमी विचारकों के विरोधी तर्क

  • भारत के लिये राष्ट्र की संकल्पना पश्चिमी राष्ट्र-राज्य की संकल्पना (एकसमान संस्कृति) से भिन्न सांस्कृतिक विविधता पर आधारित है। भारत में भाषा, धर्म, जाति, रीति-रिवाज, खान-पान और रहन-सहन सरीखे सांस्कृतिक तत्त्वों की इन्हीं विविधताओं को समन्वित करके एकता स्थापित हुई है।
  • ऐसे विचारकों का मानना है कि वर्तमान का भारत एक इकाई न होकर अलग-अलग राष्ट्रों का एक समूह है जो किसी तरह से एक बना हुआ है। इसमें न तो कोई साझापन है और न ही कोई राजनीतिक और सामाजिक चेतना ही है, जो एक राष्ट्र के रूप में इसकी पहचान बन सके।
  • पश्चिमी अनुभव इस धारणा पर आधारित रहे हैं कि राष्ट्र और सांस्कृतिक एकता परस्पर समानार्थी अवधारणाएँ हैं। ऐसा माना जाता है कि 1990 के दशक में यूगोस्लाविया तथा चेकोस्लोवाकिया का विघटन तथा ‘कोसोवो संकट’ नृजातीय एवं सांस्कृतिक विविधताओं की ही देन थे।
  • यही वजह है कि इस धारणा के समर्थक, विचारक भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभावों की ‘स्थानीय प्रकृति’ से चिंतित रहते हैं क्योंकि उनके विचार से सांस्कृतिक विविधता आधुनिक राष्ट्र-राज्य के निर्माण में बाधा उत्पन्न करती है।
    भारतीय राष्ट्र संकल्पना की विशेषता
  • तमाम विविधताओं को समन्वित कर तथा उसे अपनी राष्ट्रीय पहचान बनाते हुए एक सफल राष्ट्र के रूप में स्थापित।
  • वहीं एक नस्ल और भाषा आधारित होने के बावजूद यूरोपीय राष्ट्र-राज्यों में व्याप्त आपसी गतिरोध जैसे- स्कॉटलैंड की इंग्लैंड से अलग होने की मांग तथा कैटेलोनिया की स्पेन से अलग होने की मांग।

भारतीय राष्ट्र संकल्पना कीसमस्याएँ एवं उनसे निपटने के उपाय

  • यद्यपि भारत विविधता के संदर्भ में अनोखा राष्ट्र है किंतु यहाँ धर्म, जाति, भाषा इत्यादि के नाम पर संघर्ष होते रहते हैं। आंध्र प्रदेश, हरियाणा, पंजाब इत्यादि राज्य जहाँ भाषायी आधार पर निर्मित हुए वहीं साम्प्रदायिकता की समस्या आज तक बनी हुई है।
  • जो भिन्नताएँ संघर्ष का कारण बनती हैं, उनके बीच समन्वय स्थापित कर राष्ट्रीय एकता स्थापित की जा सकती है। इसके लिये आवश्यक है कि लोग अपने से भिन्न संस्कृति को जानें-समझें जिससे किसी प्रकार का पूर्वाग्रह न बन सके।
  • साहित्य और सिनेमा जैसे परम्परागत साधन तथा फेसबुक, यू-ट्यूब जैसे आधुनिक साधनों के माध्यम से सांस्कृतिक विविधता का प्रसार किया जा सकता है।
  • वर्तमान समय छवि निर्माण का है, इस लिहाज से भी यह अभियान महत्त्वपूर्ण होगा क्योंकि भारत के पास नृत्य, संगीत से लेकर खान-पान तक इतनी विविधता है कि अगर इसे एक राष्ट्रीय पहचान के रूप में ढाल दिया जाए तो भारत इस संदर्भ में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध कर सकता है।
  • ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ जैसे महत्त्वाकांक्षी कार्यक्रम की सफलता के लिये आवश्यक है कि राज्य एवं नागरिक दोनों अपनी भूमिका का बेहतर ढंग से निर्वाह करें।

निष्कर्ष

भारतीय समाज में विकास की अपार संभावना है क्योंकि अनेकता और विविधता विकास की ओर ले जाती है तथा जहाँ विविधता नहीं होती है अर्थात् एक जाति, एक धर्म व एक ही नस्ल; वे प्रायः विकास नहीं कर पाते हैं। इसलिये भारत देश की विविधता ही उसकी शक्ति है। जिसे बनाए रखना हम सबकी साझी ज़िम्मेदारी है।

Tuesday, May 7, 2019

कितना सफल है भारत का लोकतंत्र

Ashok Pradhan     May 07, 2019     No comments
देश में लोकसभा के चुनावों का दौर चल रहा है और कहा यह जाता है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। भारत में चुनावों को एक उत्सव की भाँति लिया जाता है। भारत के लोकतंत्र की वैश्विक प्रतिष्ठा भी है और हमारा निर्वाचन आयोग कई विकासशील एवं अल्प-विकसित देशों में होने वाले चुनावों के संचालन में सहयोग भी देता है।

लोकतंत्र सूचकांक (Democracy Index) में भारत की स्थिति

लंदन स्थित द इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट हर साल दुनियाभर के देशों के लिये डेमोक्रेसी इंडेक्स यानी लोकतंत्र सूचकांक जारी करता है। 2018 के लिये 167 देशों का यह सूचकांक जारी किया गया और इसमें भारत को 41वें स्थान पर रखा गया है। पिछले साल की तुलना में भारत को एक पायदान का फायदा मिला है, लेकिन इसके बावजूद भारत को दोषपूर्ण लोकतांत्रिक (Flawed Democracy) देशों की श्रेणी में रखा गया है। जहाँ तक स्कोर का सवाल है, पिछले 11 सालों में भारत को 2017 और 2018 दोनों वर्षों में समान रूप से सबसे कम स्कोर मिला। इस रिपोर्ट में एशिया की स्थिति में सुधार की प्रशंसा की गई है। लेकिन, चिंता का विषय यह है कि एशिया के अधिकतर देशों को दोषपूर्ण लोकतांत्रिक देशों की श्रेणी में रखा गया है।
  • द इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट लंदन स्थित इकोनॉमिस्ट ग्रुप का एक हिस्सा है जिसकी स्थापना 1946 में हुई थी। यह दुनिया के बदलते हालात पर नज़र रखती है और दुनिया की आर्थिक-राजनीतिक स्थिति के पूर्वानुमान द्वारा देश विशेष की सरकार को खतरों से आगाह करती है।

पाँच पैमानों पर दी जाती है रैंकिंग

इस रिपोर्ट में दुनिया के देशों में लोकतंत्र की स्थिति का आकलन पाँच पैरामीटर्स पर किया गया है- चुनाव प्रक्रिया और बहुलतावाद (Pluralism), सरकार की कार्यशैली, राजनीतिक भागीदारी, राजनीतिक संस्कृति और नागरिक आज़ादी। गौरतलब है कि ये सभी पैमाने एक-दूसरे से जुड़े हैं और इन पाँचों पैमानों के आधार पर ही किसी भी देश में मुक्त और स्वच्छ चुनाव और लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थिति का पता लगाया जाता है। इस रिपोर्ट में 9.87 अंकों के साथ नॉर्वे पहले स्थान पर और 1.08 अंकों के साथ उत्तर कोरिया सबसे आखिरी स्थान पर है।

रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु

  • रिपोर्ट में दुनिया के 167 देशों को शासन के आधार पर चार तरह के पैरामीटर्स पर रैंकिंग दी गई है, जिनमें पूर्ण लोकतंत्र, दोषपूर्ण लोकतंत्र, हाइब्रिड शासन और सत्तावादी शासन शामिल हैं।
  • 167 देशों में केवल 20 देशों को पूर्ण लोकतांत्रिक देश बताया गया है और इसके तहत 167 देशों की केवल 4.5 फीसदी आबादी शामिल है।
  • सबसे ज़्यादा 43.2 फीसदी आबादी दोषपूर्ण लोकतांत्रिक देशों में बसती है और इसके तहत कुल 55 देश शामिल हैं।
  • हाइब्रिड शासन के तहत 39 और सत्तावादी शासन के तहत 53 देशों को शामिल किया गया है।
  • मध्य-अमेरिका का कोस्टा रिका एकमात्र ऐसा देश है जिसने दोषपूर्ण लोकतंत्र की श्रेणी से निकलकर पूर्ण लोकतंत्र की श्रेणी में जगह बना ली है।
  • मध्य अमेरिका के ही निकारागुआ में लोकतंत्र पर भरोसा कम हुआ है और वह दोषपूर्ण लोकतंत्र से सत्तावादी शासन की श्रेणी में चला गया है।
  • 2017 के मुकाबले 2018 में जहाँ 42 देशों के कुल स्कोर में कमी आई है, वहीं 48 देश ऐसे भी हैं जिनके कुल अंकों में बढ़ोतरी हुई है।

लोकतंत्र के विभिन्न पैमानों पर भारत की स्थिति

इस रिपोर्ट में 167 देशों की सूची में भारत को 41वें स्थान पर रखा गया है। लेकिन एशिया और ऑस्ट्रेलेशिया समूह में शामिल भारत को छठा स्थान मिला है। भारत को कुल 7.23 अंक मिले हैं। अलग-अलग पैमानों पर देखें तो चुनाव प्रक्रिया और बहुलतावाद में 9.17, सरकार की कार्यशैली में 6.79, राजनीतिक भागीदारी में 7.22, राजनीतिक संस्कृति में 5.63 और नागरिक आजादी में 7.35 अंक भारत को दिये गए हैं।
  • रिपोर्ट के मुताबिक पहचान की राजनीति भारतीय राजनीति की प्रमुख विशेषता है। यानी यहाँ किसी भी पार्टी के एक चेहरे के आधार पर वोट डालने का चलन प्रभावी रूप से है। यही कारण है कि एक सामान्य उम्मीदवार जो किसी पार्टी से ताल्लुक नहीं रखता है, उसे अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिये बहुत संघर्ष करना पड़ता है।
  • रिपोर्ट में भारत की मुक्त और स्वतंत्र चुनाव प्रक्रिया की प्रशंसा भी की गई है। यही वज़ह है कि चुनाव प्रक्रिया के मामले में भारत को 9.17 अंक मिले हैं। लेकिन दूसरी तरफ, सरकार की कार्यशैली को लेकर 6.79 अंक दिये गए हैं।
  • रिपोर्ट में भारत सरकार और संवैधानिक संस्थाओं के बीच टकराहट पर भी चिंता जताई गई है। साथ ही, किसानों, रोज़गार और संस्थागत सुधार के मामले में सरकार की कार्यशैली पर भी सवाल खड़ा किया गया है। यही वज़ह है कि भारत को दोषपूर्ण लोकतंत्र वाले देशों की श्रेणी में रखा गया है।

कितना सफल है भारत का लोकतंत्र?

अपने 71 वर्षों के सफर में भारत का लोकतंत्र कितना सफल रहा, यह देखने के लिये इन वर्षों का इतिहास, देश की उपलब्धियाँ, देश का विकास, सामाजिक-आर्थिक दशा, लोगों की खुशहाली आदि पर गौर करने की ज़रूरत है। भारत का लोकतंत्र बहुलतावाद पर आधारित राष्ट्रीयता की कल्पना पर आधारित है। यहाँ की विविधता ही इसकी खूबसूरती है। सिर्फ दक्षिण एशिया को ही लें तो, भारत और क्षेत्र के अन्य देशों के बीच यह अंतर है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान और श्रीलंका में उनके विशिष्ट धार्मिक समुदायों का दबदबा है। लेकिन, धर्मनिरपेक्षता भारत का एक बेहद सशक्त पक्ष रहा है। सूचकांक में भारत का पड़ोसी देशों से बेहतर स्थिति में होने के पीछे यह एक बड़ा कारण है।
पिछले 71 सालों में देश ने प्रगति की है, काफी विकास किया है। देशवासियों का जीवन-स्तर पहले से बेहतर हुआ है। सभी धर्मों, जातियों और वर्गों के लोग एक ही समाज में एक साथ रहते हैं। कृषि, औद्योगिक विकास, शिक्षा, चिकित्सा, अंतरिक्ष विज्ञान जैसे कई क्षेत्रों में भारत ने कामयाबी हासिल की है। अर्थव्यवस्था के मामले में हम दुनिया की छठी बड़ी शक्ति हैं। आज हमारे पास विदेशी मुद्रा का विशाल भंडार है। लेकिन किसी लोकतंत्र की सफलता को आँकने के लिये ये पर्याप्त नहीं हैं।
इसमें कोई शक नहीं कि देश का विकास तो हुआ है, लेकिन देखना यह होगा कि विकास किन वर्गों का हुआ। सामाजिक समरसता के धरातल पर विकास का यह दावा कितना सटीक बैठता है। दरअसल, किसी लोकतंत्र की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि सरकार ने गरीबी, निरक्षरता, सांप्रदायिकता, लैंगिक भेदभाव और जातिवाद को किस हद तक समाप्त किया है। लोगों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति क्या है और सामाजिक तथा आर्थिक असमानता को कम करने के क्या-क्या प्रयास हुए हैं।
इन सभी मोर्चों पर भारत का प्रदर्शन कोई बहुत उल्लेखनीय तो नहीं ही रहा है।

क्या है वर्तमान स्थिति?

  • संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की लगभग 36 करोड़ आबादी अभी भी स्वास्थ्य, पोषण, स्कूली शिक्षा और स्वच्छता से वंचित है। दूसरी तरफ, देश का एक तबका ऐसा है जिसे किसी चीज़ की कोई कमी नहीं है।
  • विश्व असमानता रिपोर्ट के अनुसार, भारत की राष्ट्रीय आय का 22 फीसदी हिस्से पर सिर्फ 1 फीसदी लोगों का कब्ज़ा है और यह असमानता लगातार तेज़ी से बढ़ रही है। अंतर्राष्ट्रीय अधिकार समूह Oxfam के मुताबिक, भारत के इस 1 फीसदी समूह ने देश के 73 फीसदी धन पर कब्ज़ा किया हुआ है।
  • लैंगिक भेदभाव भी बहुत बड़ी समस्या बनकर उभर रहा है। विश्व आर्थिक फोरम द्वारा जारी जेंडर गैप इंडेक्स में भारत 108वें पायदान पर है और UNDP द्वारा जारी लिंग असमानता सूचकांक-2017 में भारत को 127वें स्थान पर रखा गया है।
  • लोकतंत्र का चौथा खंभा माने जाने वाले मीडिया की आज़ादी भी सवालों के घेरे में है। दरअसल, पेरिस स्थित गैर-सरकारी संस्था ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ द्वारा जारी वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स-2018 में भारत पहले की तुलना में दो स्थान नीचे उतरा है और इसे 138वाँ स्थान मिला।
  • इन 71 वर्षों में अन्य बातों के अलावा सांप्रदायिकता, क्षेत्रवाद और कट्टरवाद को भी प्रश्रय मिला। इसकी वज़ह से असहिष्णुता की प्रवृत्ति भी बढ़ी है। जातिवाद की जड़ें लगातार गहरी होती जा रही हैं।
निस्संदेह इस तरह की परिस्थितियाँ लोकतंत्र की कामयाबी की राह में बाधक बनती है।

बहुत कुछ करना बाकी है

  • लोकतंत्र की कामयाबी के लिये ज़रूरी है कि सरकार अपने निहित स्वार्थों से ऊपर उठकर जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने की कोशिश करे। विकास के तमाम दावों के बावजूद देश में गरीबी, भुखमरी, बेरोज़गारी आदि बेहद गंभीर समस्याएँ है। आज़ादी के 71 सालों बाद भी करोड़ों लोग दयनीय जीवन जीने को मजबूर हैं।
  • विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका लोकतांत्रिक शासन-पद्धति के अंग होते हैं, लेकिन इन तीनों में ही अव्यवस्था का बोलबाला है और ये बेहद दबाव में काम करती हैं।
  • जनता की भागीदारी की कमी की वज़ह से ही हमारा लोकतंत्र महज एक ‘चुनावी लोकतंत्र’ बनकर रह गया है। चुनाव में मतदान का प्रयोग एक अधिकार के रूप में नहीं, एक कर्त्तव्य के रूप में किया जाने लगा है।
  • लोकतांत्रिक व्यवस्था को लेकर बुनियादी सवाल कहीं पीछे छूट गए हैं और लोकतंत्र में जनता की भागीदारी और लोकतांत्रिक संस्कृति को विकसित करने के लिये पहले बुनियादी समस्याओं को हल किया जाना ज़रूरी है ताकि लोकतांत्रिक व्यवस्था को सफल बनाया जा सके।

Tuesday, April 30, 2019

विश्व व्यापार संगठन में ‘नए मुद्दे’

Ashok Pradhan     April 30, 2019     No comments

चर्चा में क्यों?

  • भारत, धनी राष्ट्रों द्वारा ‘श्रम और पर्यावरण’ जैसे नए मुद्दों को डब्ल्यूटीओ के समक्ष उठाने के प्रयासों का विरोध कर व्यापक पुनर्विचार की मांग कर रहा है।
  • इन नए मुद्दों का संबंध श्रम कार्य, पर्यावरणीय मानकों, वैश्विक मूल्य शृंखला (GVCs) और आपूर्ति शृंखला को प्रोत्साहन, ई-वाणिज्य, प्रतिस्पर्द्धा एवं निवेश प्रावधानों (Competition and investment provisions), स्वच्छ एवं हरित ऊर्जा का उपयोग करके पर्यावरणीय और टिकाऊ वस्तुओं का उत्पादन, सरकारी खरीद में पारदर्शिता, राज्य के स्वामित्व वाले उद्यम और नामित एकाधिकारों से है।
  • भारत दोहा चक्र से संबंधित शेष बचे मुद्दों को हल करने के पश्चात् ही इन गैर-व्यापारिक (non-trade) मुद्दों पर विश्व व्यापार संगठन में विचार-विमर्श करना चाहता है। भारत की इस मांग का कुछ अन्य विकासशील देश भी समर्थन कर रहे हैं।
  • भारत ने यह रुख इसलिये अपनाया है क्योंकि इन गैर-व्यापारिक मुद्दों की घोषणा के कारण वर्ष 2015 में नैरोबी में हुए विश्व व्यापार संगठन के मंत्रिस्तरीय सम्मेलन की समाप्ति हो गई थी तथा दोहा चक्र की वार्त्ता के मुद्दों की पुनः पुष्टि नहीं की गई जबकि दोहा वार्त्ता का उद्देश्य ‘वैश्विक व्यापार (global trade) के लिये मार्ग खोलना’ था।
विरोध के कारण
  • भारत यह विश्वास करता है कि दोहा वार्त्ता में नए मुद्दों को उठाए जाने से विकासात्मक एजेंडे पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है। भारत यह महसूस करता है कि पर्यावरण और श्रम जैसे मुद्दों को विश्व व्यापार संगठन के क्षेत्र से बाहर रखा जाना चाहिये अथवा इनका समाधान वैश्विक निकायों, जैसे–यूएनएफसीसीसी (UNFCCC) और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के माध्यम से किया जाना चाहिये।
  • भारत जैसे विकासशील देश अधिकांश क्षेत्रों, जैसे–श्रम (बाल श्रम, बंधुआ श्रम और सस्ते कामगार आदि) और पर्यावरण (प्रदूषण का उच्च स्तर और कचरा प्रबंधन के खराब मानक) में विकास की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।
  • चूँकि धनी राष्ट्रों के पास इन मुद्दों से संबंधित बेहतर मानक होते हैं अतः वे गैर-शुल्क अवरोधों के रूप में कार्य करके विकासशील राष्ट्रों को चुनौती दे सकते हैं । इस प्रकार विकासशील राष्ट्रों से विकसित राष्ट्रों को होने वाले निर्यात प्रभावित होते हैं।
  • विकसित राष्ट्रों में स्थित अधिकांश बहुराष्ट्रीय फर्म विश्व में अपने उत्पादन नेटवर्क के लिये अनुबंध निर्माताओं, आपूर्तिकर्ताओं और रसद प्रदाताओं (Suppliers and logistics providers) के माध्यम से वैश्विक मूल्य शृंखला का उपयोग करती हैं।
  • भारत की निवेश के प्रति चिंता विश्व व्यापार संगठन के एजेंडे का एक भाग बन गया है। भारत की यह चिंता ‘निवेश’ की परिभाषा और निवेशक विवाद निपटान तंत्र (investor dispute settlement mechanism) से संबंधित है।
  • इसके अतिरिक्त नए मुद्दों पर विचार करने से पूर्व वर्ष 2013 की ‘बाली मंत्रिस्तरीय घोषणा’ में विकासशील देशों में रह रहे गरीब किसानों के हितों के संरक्षण हेतु ‘विशेष सुरक्षा तंत्र’ और खाद्य सुरक्षा के लिये ‘सार्वजानिक भंडारण’ का स्थायी समाधान जैसे शेष बचे मुद्दों का समाधान करना आवश्यक है।
विशेष सुरक्षा तंत्र (special safeguard mechanism)
यह व्यापार से संबधित एक उपाय है जिसके तहत विकासशील राष्ट्र आयातों में हुई एकाएक वृद्धि और मूल्यों में गिरावट के कारण इनका विरोध करने के लिये अस्थायी तौर पर आयातित कृषि उत्पादों पर लगने वाले शुल्क की दरों में बढ़ोतरी कर सकते हैं। इस प्रकार यह गरीब किसानों के हितों की रक्षा करता है।
आगे की राह
भारत चाहता है कि नए मुद्दों में विकास के दृष्टिकोण को भी शामिल किया जाए। इसमें मानवों (जैसे कुशल पेशेवरों) के सहज आवागमन पर विचार-विमर्श और ऐसे कार्यों को जो धनी राष्ट्रों के हितों के प्रतिकूल हों और जिसमें स्थानीय लोगों के रोजगारों में होने वाले नुकसानों को भी शामिल किया जाता है।
भारत चाहता है कि अग्रलिखित दो मानदंडों को प्राप्त करने के लिये देशों पर ‘गैर-मुद्दों (non-issue)’ को विश्व व्यापार संगठन के समक्ष प्रस्तुत करने के लिये दबाव डाला जाना चाहिये-
  • व्यापार के संदर्भ में मुद्दों की प्रासंगिकता को स्थापित करना।
  • विश्व व्यापार संगठन के सभी 164 सदस्यों के मध्य कार्यसूची (agenda) के क्रियान्वयन हेतु आम सहमति को सुनिश्चित करना।
  • परंतु भारत नए मुद्दों को भी नजरअंदाज नहीं कर सकता है। यदि भारत अपना राष्ट्रीय हित चाहता है तो इसे नए मुद्दों के संबंध में वार्त्ता करने पर अपनी सहमति प्रकट करनी चाहिये।
भारत, नए मुद्दों को विश्व व्यापार संगठन के समक्ष रखे जाने के प्रयासों को समाप्त करने में तभी सफल हो सकता है, यदि यह विकासशील एवं गरीब राज्यों का एक मजबूत गठबंधन तैयार कर ले तथा प्रभावी रूप से उनका प्रतिनिधित्व करने के लिये विश्व व्यापार संगठन के विवाद निपटान निकाय (WTO’s dispute settlement machanism), में व्यापार कानून विशेषज्ञों के माध्यम से उन्हें पर्याप्त प्रशिक्षण दे।
इसके लिये, भारत को अपनी कूटनीतिक क्षमता को बढ़ाने की आवश्यकता है। नैरोबी की बैठक में यह देखा गया था कि विचारों के मामले में विकसित राष्ट्र तो एकजुट थे परंतु विकासशील राष्ट्रों में मतभेद था।
सभी महाद्वीपों के विकासशील राष्ट्रों को एकमत करने के लिये संयुक्त प्रयासों की आवश्यकता होगी। अमेरिका कई वर्षों से इसी रणनीति पर कार्य कर रहा है और यही कारण है कि यह सभी दृष्टिकोणों से विश्व की सर्वाधिक सकारात्मक व जटिल शक्ति है।

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