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Wednesday, July 3, 2019

भारत की दार्शनिक प्रवृत्तियाँ (Philosophical trends of India)

Ashok Pradhan     July 03, 2019     No comments

भारत में पहली शताब्दी से पूर्व ही 6 आस्तिक व 3 नास्तिक दार्शनिक मतों का प्रतिपादन हो चुका था।

प्राचीन भौतिक दर्शन

प्रणेता

उच्छेदवादअजित केश कम्बलिन
अक्रियावादीपूरण कश्यप
नित्यवादीपकुद कच्चायन
नियतिवादीमक्खलि गोशाल
अनिश्चयवादीसंजय वेलट्पुत्त
  • आस्तिक मत को षडांग दर्शन सिद्धांत कहते हैं जिसमें सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदांत शामिल हैं।
  • नास्तिक मत में बौद्ध, जैन तथा चार्वाक प्रमुख हैं, इसे भौतिकतावादी दर्शन भी कहते हैं।

सांख्य

  • कपिल मुनि द्वारा प्रवर्तित इस दर्शन को भारत का प्राचीनतम दर्शन माना जाता है।
  • इनकी रचना है- तत्त्व समास।
  • बाद के आचार्यों में ईश्वरकृष्ण प्रमुख हैं और उनका ग्रंथ ‘सांख्यकारिका’ प्रसिद्ध है।
  • इसमें सत्कार्यवाद, विकासवाद तथा भौतिकता के साथ-साथ संख्या आधारित आध्यात्मिकता और वैज्ञानिकता प्रसिद्ध है।

योग दर्शन

  • इसके प्रणेता पतंजलि हैं जिन्होंने ‘योगसूत्र’ नामक ग्रंथ की रचना की।
  • ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों का निग्रह, योगमार्ग का मूलाधार है।
  • भारत के इस दर्शन की महत्ता ऐसी रही कि वर्तमान दौर में यू.एन.ओ. द्वारा 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया गया है।

न्याय

  • न्याय-दर्शन के प्रवर्तक महर्षि गौतम माने जाते हैं, जिनका ग्रंथ ‘न्यायसूत्र’ इस दार्शनिक प्रवृत्ति का पहला ग्रंथ माना जाता है।
  • 12वीं सदी में न्याय दर्शन को नया रूप गंगेश उपाध्याय ने अपने ग्रंथ ‘तत्त्व चिंतामणि’ में दिया।
  • इस दर्शन में तर्क और प्रमाण के प्रयोग का महत्त्व प्रतिपादित हुआ है।

वैशेषिक

  • इस दर्शन के प्रवर्तक महर्षि कणाद हैं जिन्होंने ‘कणाद-सूत्र’ रचा।
  • इन्होंने द्रव्य अर्थात् भौतिक तत्त्वों का विवेचन करते हुए परमाणुवाद की स्थापना की।

मीमांसा

  • कर्मकांड, यज्ञ आधारित इस दर्शन के प्रतिपादन में आचार्य जैमिनी का नाम अग्रगण्य है।
  • मीमांसा के अनुसार वेदों में कही गई बातें सदा सत्य हैं।
  • यह पुरोहितवाद, बाह्य आडंबर को बढ़ावा देने वाला दर्शन है।

वेदांत

  • ईसा-पूर्व दूसरी सदी में संकलित बादरायण का ब्रह्मसूत्र इस दर्शन का मूल ग्रंथ है। इसे उत्तर मीमांसा भी कहते हैं।
  • बाद में इस पर दो प्रख्यात भाष्य शंकराचार्य (9वीं सदी) और रामानुज (12वीं सदी) द्वारा लिखे गए।

वेदांत आधारित अन्य दार्शनिक मत

भाष्यकारवादभाष्य
शंकराचार्य (8–9वीं सदी)अद्वैतवादशंकरभाष्य
रामानुजाचार्य (11–12वीं सदी)विशिष्टाद्वैतवादश्रीभाष्य
मध्वाचार्य (13–14वीं सदी)द्वैतवादपूर्णप्रज्ञभाष्य
वल्लभाचार्य (15–16वीं सदी)शुद्धाद्वैतवादअणुभाष्य
निम्बार्काचार्य (13वीं सदी)भेदाभेदवादवेदांत परिजात सौरभ
  • ज्ञान आधारित इस दर्शन की पृष्ठभूमि में उपनिषद् था और ब्राह्मण-हिन्दू धर्म का अधिकांश दार्शनिक मतवाद इसी वेदांत दर्शन से प्रभावित-प्रेरित रहा है।

Tuesday, April 30, 2019

मंदिर वास्तुकला

Ashok Pradhan     April 30, 2019     1 comment
  • मंदिर निर्माण की प्रक्रिया का आरंभ तो मौर्य काल से ही शुरू हो गया था किंतु आगे चलकर उसमें सुधार हुआ और गुप्त काल को मंदिरों की विशेषताओं से लैस देखा जाता है।
  • संरचनात्मक मंदिरों के अलावा एक अन्य प्रकार के मंदिर थे जो चट्टानों को काटकर बनाए गए थे। इनमें प्रमुख है महाबलिपुरम का रथ-मंडप जो 5वीं शताब्दी का है।
  • गुप्तकालीन मंदिर आकार में बेहद छोटे हैं- एक वर्गाकार चबूतरा (ईंट का) है जिस पर चढ़ने के लिये सीढ़ी है तथा बीच में चौकोर कोठरी है जो गर्भगृह का काम करती है।
  • कोठरी की छत भी सपाट है व अलग से कोई प्रदक्षिणा पथ भी नहीं है।
  • इस प्रारंभिक दौर के निम्नलिखित मंदिर हैं जो कि भारत के प्राचीनतम संरचनात्मक मंदिर हैं: तिगवा का विष्णु मंदिर (जबलपुर, म.प्र.), भूमरा का शिव मंदिर (सतना, म.प्र.), नचना कुठार का पार्वती मंदिर (पन्ना, म.प्र.), देवगढ़ का दशावतार मंदिर (ललितपुर, यू.पी.), भीतरगाँव का मंदिर (कानपुर, यू.पी.) आदि।
  • मंदिर स्थापत्य संबंधी अन्य नाम, जैसे- पंचायतन, भूमि, विमान भद्ररथ, कर्णरथ और प्रतिरथ आदि भी प्राचीन ग्रंथों में मिलते हैं।
  • छठी शताब्दी ईस्वी तक उत्तर और दक्षिण भारत में मंदिर वास्तुकला शैली लगभग एकसमान थी, लेकिन छठी शताब्दी ई. के बाद प्रत्येक क्षेत्र का भिन्न-भिन्न दिशाओं में विकास हुआ।
  • आगे ब्राह्मण हिन्दू धर्म के मंदिरों के निर्माण में तीन प्रकार की शैलियों नागर, द्रविड़ और बेसर शैली का प्रयोग किया गया।

    मंदिर स्थापत्य

    नागरद्रविड़बेसर
     पाल उपशैली पल्लव उपशैली राष्ट्रकूट
     ओडिशा उपशैली चोल उपशैली चालुक्य
     खजुराहो उपशैली पाण्डय उपशैली काकतीय
     सोलंकी उपशैली विजयनगर उपशैली होयसल
     नायक उपशैली
क्रम
मंदिर
स्थल
कालखंड
1.
गोलाकार ईंट व इमारती लकड़ी का मंदिर
बैराट ज़िला राजस्थान
तृतीय शताब्दी ईसा पूर्व
2.
साँची का मंदिर- 40
साँची (मध्य प्रदेश)
तृतीय शताब्दी ईसा पूर्व
3.
साँची का मंदिर-18
साँची (मध्य प्रदेश)
द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व
4.
प्राचीनतम संरचनात्मक मंदिर
ऐहोल (कर्नाटक)
चौथी शताब्दी ईसा पूर्व
5.
साँची का मंदिर-17
साँची (मध्य प्रदेश)
चौथी सदी
6.
लड़खन मंदिर
ऐहोल (कर्नाटक)
पाँचवीं सदी ईस्वी सन्
7.
दुर्गा मंदिर
ऐहोल (कर्नाटक)
550 ईस्वी सन्
नागर शैली
  • ‘नागर’ शब्द नगर से बना है। सर्वप्रथम नगर में निर्माण होने के कारण इसे नागर शैली कहा जाता है।
  • यह संरचनात्मक मंदिर स्थापत्य की एक शैली है जो हिमालय से लेकर विंध्य पर्वत तक के क्षेत्रों में प्रचलित थी।
  • इसे 8वीं से 13वीं शताब्दी के बीच उत्तर भारत में मौजूद शासक वंशों ने पर्याप्त संरक्षण दिया।
  • नागर शैली की पहचान-विशेषताओं में समतल छत से उठती हुई शिखर की प्रधानता पाई जाती है। इसे अनुप्रस्थिका एवं उत्थापन समन्वय भी कहा जाता है।
  • नागर शैली के मंदिर आधार से शिखर तक चतुष्कोणीय होते हैं।
  • ये मंदिर उँचाई में आठ भागों में बाँटे गए हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं- मूल (आधार), गर्भगृह मसरक (नींव और दीवारों के बीच का भाग), जंघा (दीवार), कपोत (कार्निस), शिखर, गल (गर्दन), वर्तुलाकार आमलक और कुंभ (शूल सहित कलश)।
  • इस शैली में बने मंदिरों को ओडिशा में ‘कलिंग’, गुजरात में ‘लाट’ और हिमालयी क्षेत्र में ‘पर्वतीय’ कहा गया।
द्रविड़ शैली
  • कृष्णा नदी से लेकर कन्याकुमारी तक द्रविड़ शैली के मंदिर पाए जाते हैं।
  • द्रविड़ शैली की शुरुआत 8वीं शताब्दी में हुई और सुदूर दक्षिण भारत में इसकी दीर्घजीविता 18वीं शताब्दी तक बनी रही।
  • द्रविड़ शैली की पहचान विशेषताओं में- प्राकार (चहारदीवारी), गोपुरम (प्रवेश द्वार), वर्गाकार या अष्टकोणीय गर्भगृह (रथ), पिरामिडनुमा शिखर, मंडप (नंदी मंडप) विशाल संकेन्द्रित प्रांगण तथा अष्टकोण मंदिर संरचना शामिल हैं।
  • द्रविड़ शैली के मंदिर बहुमंजिला होते हैं।
  • पल्लवों ने द्रविड़ शैली को जन्म दिया, चोल काल में इसने उँचाइयाँ हासिल की तथा विजयनगर काल के बाद से यह ह्रासमान हुई।
  • चोल काल में द्रविड़ शैली की वास्तुकला में मूर्तिकला और चित्रकला का संगम हो गया।
  • यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल तंजौर का वृहदेश्वर मंदिर (चोल शासक राजराज- द्वारा निर्मित) 1000 वर्षों से द्रविड़ शैली का जीता-जागता उदाहरण है।
  • द्रविड़ शैली के अंतर्गत ही आगे नायक शैली का विकास हुआ, जिसके उदाहरण हैं- मीनाक्षी मंदिर (मदुरै), रंगनाथ मंदिर (श्रीरंगम, तमिलनाडु), रामेश्वरम् मंदिर आदि।
बेसर शैली
  • नागर और द्रविड़ शैलियों के मिले-जुले रूप को बेसर शैली कहते हैं।
  • इस शैली के मंदिर विंध्याचल पर्वत से लेकर कृष्णा नदी तक पाए जाते हैं।
  • बेसर शैली को चालुक्य शैली भी कहते हैं।
  • बेसर शैली के मंदिरों का आकार आधार से शिखर तक गोलाकार (वृत्ताकार) या अर्द्ध गोलाकार होता है।
  • बेसर शैली का उदाहरण है- वृंदावन का वैष्णव मंदिर जिसमें गोपुरम बनाया गया है।
  • गुप्त काल के बाद देश में स्थापत्य को लेकर क्षेत्रीय शैलियों के विकास में एक नया मोड़ आता है।
  • इस काल में ओडिशा, गुजरात, राजस्थान एवं बुंदेलखंड का स्थापत्य ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है।
  • इन स्थानों में 8वीं से 13वीं सदी तक महत्त्वपूर्ण मंदिरों का निर्माण हुआ।
  • इसी दौर में दक्षिण भारत में चालुक्य, पल्लव, राष्ट्रकूटकालीन और चोलयुगीन स्थापत्य अपने वैशिष्ट्य के साथ सामने आया।

भारतीय स्थापत्य

Ashok Pradhan     April 30, 2019     No comments

बुंदेलखंड का स्थापत्य

  • इसे खजुराहो उपशैली भी कहा जाता है।
  • यह उपशैली 10वीं से 13वीं शताब्दी के बीच रही जिसे चंदेल शासकों ने पर्याप्त संरक्षण प्रदान किया।
  • यहाँ मंदिर निर्माण में पन्ना खदान के स्थानीय गुलाबी व मटमैले ग्रेनाइट एवं लाल बलुआ पत्थर का इस्तेमाल हुआ है।
  • खजुराहो उपशैली के मंदिरों में परकोटे का पूर्ण अभाव है यानी मंदिर चहारदीवारी में नहीं हैं।
  • ‘उरूश्रृंग’ व ‘अंतराल’ बुंदेलखंड स्थापत्य की अपनी विशेष पहचान है।
  • शिखर के ऊपर निकली हुई मीनारनुमा आकृति को ‘उरू शृंग’ कहते हैं तथा गर्भगृह और बरामदे के बीच के लंबे गलियारे को ‘अंतराल’ कहते हैं।
  • मंदिर की प्रतिमाओं में देवता एवं देवी, अप्सरा के अलावा संभोगरत प्रतिमाएँ तथा पशुओं की आकृतियाँ हैं।
  • खजुराहो के पश्चिमी समूह में लक्ष्मण, कंदरिया महादेव, मतंगेश्वर, लक्ष्मी, जगदम्बा, चित्रगुप्त, पार्वती तथा गणेश मंदिर और वराह व नंदी के मंडप शामिल हैं।
  • खजुराहो के पूर्वी समूहों के मंदिरों में ब्रह्मा, वामन, जवारी व हनुमान मंदिर और जैन मंदिरों में आदिनाथ, पार्श्वनाथ, आदिनाथ घंटाई मंदिर शामिल हैं।
  • खजुराहो के मंदिरों को यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में स्थान प्राप्त है।
  • खजुराहो के समस्त मंदिरों में कला-तकनीक, निर्माण प्रक्रिया, भव्यता आदि की दृष्टि से कंदरिया महादेव मंदिर को सर्वोत्तम आँका गया है।

पालकालीन स्थापत्य

  • पालकालीन स्थापत्य के इस दौर में विक्रमशिला विहार, ओदंतपुरी विहार, जगदल्ला विहार आदि का निर्माण हुआ।
  • धर्मपाल द्वारा निर्मित सोमापुर महाविहार (बांग्लादेश) सबसे बड़ा बौद्ध विहार है जिसे यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल किया गया।
  • नालंदा महाविहार की स्थापना तो गुप्तकाल (कुमारगुप्त) में हुई, किंतु पाल शासकों ने भी इसके विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
हीनयानी चैत्य-गृहमहायानी चैत्य-गृह
प्रारंभिक दौर में हीनयानी चैत्य बनाए गए थे।परवर्ती दौर में महायानी चैत्य बनाए गए थे।
इसका कालखंड प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व से तृतीय शताब्दी तक है।इसका कालखंड प्रथम शताब्दी ईस्वी सन् से 5वीं शताब्दी ईस्वी सन् तक है।
इसमें चैत्य के निकट वाले विहार में रहने वाले लोग भी हीनयानी थे।इसमें चैत्य के निकट वाले विहार में रहने वाले लोग भी महायानी थे।
इसमें बुद्ध के प्रतीकों का ही चलन है। कहीं भी बुद्ध को मानव रूप में नहीं दर्शाया गया है।इसमें बुद्ध को मानव रूप में दर्शाया गया है।
हीनयानी चैत्यगृहों का क्रम है-भाजा, पीतलखोड़ा, कोण्डानी , अजंता-9 , अजंता-10 ,पांडवलेनी, विदिशा, कार्ले, कन्हेरी। कार्ले इसमें सर्वोत्तम चरम अवस्था है।महायानी चैत्यगृहों का क्रम है- भट्टीप्रोलू, गोली, जगैइपेट, घंटशाल, नागार्जुनकोंडा, अमरावती, अजंता-19, अजंता-26, एलोरा। इसमें चरम और सर्वोत्तम है- अमरावती चैत्य

गुजरात का स्थापत्य

  • गुजरात के स्थापत्य को सोलंकी उपशैली, चालुक्य उपशैली या मंडोवार उपशैली भी कहा जाता है।
  • इसके तहत हिन्दू मंदिरों के साथ-साथ जैन मंदिरों का भी निर्माण हुआ।
  • अर्द्ध-गोलाकार पीठ और ‘मंडोवार’ गुजरात उपशैली की पहचान विशेषता हैं।
  • वह अर्द्ध-गोलाकार संरचना जिसकी वजह से छत-शिखर अलग-अलग दिखता है, उसे मंडोवार कहते हैं।
  • माउंट आबू का आदिनाथ मंदिर, तेजपाल मंदिर, पालिताना के सैकड़ों मंदिर, सोमनाथ मंदिर, मोढ़ेरा का सूर्य मंदिर आदि इस शैली के प्रमुख उदाहरण हैं।
  • माउंट आबू पर बने कई मंदिरों में संगमरमर के दो मंदिर हैं- दिलवाड़ा का जैन मंदिर तथा तेजपाल मंदिर (अर्बुदगिरी के बगल में)।
  • कुंभरिया के पार्श्वनाथ मंदिर में भी राजस्थान के मकरान से उपलब्ध काले और सपेद संगमरमर का इस्तेमाल किया गया है।
  • माउंट आबू के मंदिरों का निर्माण सोलंकी शासक भीम सिंह प्रथम के मंत्री दंडनायक विमल ने करवाया था, इसी कारण इसे विमलबसाही मंदिर भी कहते हैं।
  • सोमनाथ मंदिर को सोलंकी शासकों की देन न मानकर गुर्जर-प्रतिहारों की देन माना जाता है।

सैंधव वास्तुकला

  
        सैंधव कला उपयोगितामूलक थी। सिंधु सभ्यता की सबसे प्रभावशाली विशेषता उसकी नगर         निर्माण योजना एवं जल-मल निकास प्रणाली थी।
  • सिंधु सभ्यता की नगर योजना में दुर्ग योजना, स्नानागार, अन्नागार, गोदीवाड़ा, वाणिज्यिक परिसर आदि महत्त्वपूर्ण हैं।
  • हड़प्पा सभ्यता के समस्त नगर आयताकार खंड में विभाजित थे जहाँ सड़कें एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं। इसे ग्रिड प्लानिंग कहा जाता है।
  • हड़प्पा सभ्यता के नगरीय क्षेत्र के दो हिस्से थे- पश्चिमी टीला (Upper town) और पूर्वी टीला (Lower town)।
  • हड़प्पा काल में भवनों में पक्की और निश्चित आकार की ईंटों के प्रयोग के अलावा लकड़ी और पत्थर का भी प्रयोग होता था।
  • घर के बीचोंबीच बरामदा बनाया जाता था और मुख्य द्वार हमेशा घर के पीछे खुलता था।
  • घर के गंदे पानी की निकासी के लिये ढकी हुई नालियाँ बनाई गईं और इन्हें मुख्य नाले से जोड़कर गंदे पानी की निकासी की जाती थी।
  • जल-आपूर्ति व्यवस्था का साक्ष्य ‘धौलावीरा’ से मिला है जहाँ वर्षा जल को शुद्ध कर उसकी आपूर्ति की जाती थी।
  • हड़प्पा सभ्यता में दोमंजिला भवन हैं, सीढ़ियाँ हैं, पक्की-कच्ची ईंटों का इस्तेमाल है, किंतु गोलाकार स्तंभ और घर में खिड़की का चलन नहीं है।
  • हड़प्पा सभ्यता के नगरों में कहीं भी मंदिर का स्पष्ट प्रमाण नहीं मिला।
  • हड़प्पा से प्राप्त विशाल अन्नागार, मोहनजोदड़ो का विशाल स्नानागार (39 × 23 × 8 फुट), अन्नागार व सभा भवन परिसर तथा लोथल (गुजरात) से प्राप्त व्यावसायिक क्षेत्र परिसर और विशालतम गोदीवाड़ा हड़प्पा सभ्यता की नगर निर्माण योजना के उत्कृष्ट नमूने हैं।
  • हड़प्पा सभ्यता (2750&1700 B.C.) में स्थापत्य/वास्तुकला ने जो उँचाई प्राप्त की थी वह वैदिक काल (1500&600 B.C.) तक आते-आते समाप्त हो चुकी थी। अत: वैदिक काल स्थापत्य कला की दृष्टि से ह्रास का काल है।
  • वैदिकोत्तर काल के दो महत्त्वपूर्ण अवशेष हैं- बिहार में राजगृह शहर की किलाबंदी (6-5वीं ईसा पूर्व) तथा प्राचीन कलिंगनगर की किलाबंद राजधानी शिशुपालगढ़ (ईसा पूर्व द्वितीय-प्रथम शताब्दी)।
  • अशोक के काल में संगतराशी और पत्थर पर नक्काशी फारस की देन थी।
  • मेगस्थनीज के अनुसार पाटलिपुत्र में चंद्रगुप्त मौर्य का महल समकालीन ‘सूसा’ साम्राज्य के प्रासाद को भी मात करता है।
  • पाटलिपुत्र में एक विशाल इमारती लकड़ी की दीवार के अवशेष मिले हैं जिससे राजधानी को घेरा गया था।
  • सारनाथ का स्तंभ मौर्यकालीन कला का उत्कृष्ट नमूना है।
  • इन स्तंभों पर एक खास तरह की पॉलिश ‘ओप’ की गई थी जिससे इनकी चमक धातु जैसी हो गई। किंतु पॉलिश की यह कला समय के साथ लुप्त हो गई।

क्रम

आधार

पश्चिमी टीला (Upper town)

पूर्वी टीला (Lower Town)

1.दिशा
अपेक्षाकृत यह पश्चिम दिशा में स्थित था।
यह पूर्व दिशा में स्थित था।
2.
ऊँचाई
यह ज़्यादा ऊँचाई पर था।
यह कम ऊँचाई पर था।
3.दुर्गीकरण
यह पूर्णतया दुर्गीकृत क्षेत्र था।
यह दुर्गीकृत नहीं था।
4.जनसंख्या
यह कम आबादी वाला क्षेत्र था।
यह अधिक आबादी वाला क्षेत्र था।
5.इमारतें
यहाँ विशिष्ट इमारतें मौजूद थीं, जैसे- स्नानागार, अन्नगार आदि।
यहाँ साधारण इमारतें थीं, जैसे- एककक्षीय श्रमिक भवन आदि।

चालुक्यकालीन स्थापत्य

  • बादामी के चालुक्यों की कला की शुरुआत ऐहोल से है, जबकि चरमोत्कर्ष बादामी और पट्टदकल में दिखता है।
  • यह नागर और द्रविड़ शैली की विशेषताओं से युक्त बेसर शैली है।
  • यहाँ के मंदिरों में चट्टानों को काटकर संयुक्त कक्ष और विशेष ढाँचे वाले मंदिरों का निर्माण देखने को मिलता है।
  • ऐहोल में 70 से अधिक मंदिर हैं जिनमें रविकीर्ति द्वारा बनवाया गया मेगुती जैन मंदिर तथा लाड़ खाँ का सूर्य मंदिर बहुत प्रसिद्ध हैं।
  • बादामी के गुफा मंदिरों में खंभों वाला बरामदा, मेहराब युक्त कक्ष, छोटा गर्भगृह और उनकी गहराई प्रमुख है।
  • बादामी में मिली चार गुफाएँ शिव, विष्णु, विष्णु अवतार व जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ से संबंधित हैं।
  • बादामी के भूतनाथ, मल्लिकार्जुन और येल्लमा के मंदिरों के स्थापत्य को सराहना मिली है।
  • पट्टदकल के विरूपाक्ष मंदिर का स्थापत्य अति विशिष्ट है। इसके अलावा यहाँ के मंदिरों में संगमेश्वर, पापनाथ आदि हैं।
  • पट्टदकल के मंदिरों में चालुक्यकालीन स्थापत्य पूरे निखार पर है इसलिये इन्हें यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल किया गया है।

राष्ट्रकूटकालीन स्थापत्य

  • राष्ट्रकूटकालीन स्थापत्य में महाराष्ट्र के औरंगाबाद में एलोरा नामक स्थल और मुंबई के निकट द्वीपीय स्थल एलीफैंटा की गुफाएँ महत्त्वपूर्ण हैं।
  • ‘रॉक कट आर्किटेक्चर’ का बेहतरीन उदाहरण हैं एलोरा की गुफाएँ। इन्हें विश्व विरासत की सूची में शामिल किया गया है।
  • इसमें कैलाश गुहा मंदिर (गुफा संख्या-16) की गणना विश्व स्तर की भव्यतम कलाकृतियों में की जाती है। इसकी तुलना एथेंस के प्रसिद्ध मंदिर ‘पार्थेनन’ से की गई है।
  • विश्व विरासत में शामिल एलीफैंटा की अधिकतर गुफाएँ हिन्दू (शिव) धर्म और शेष बौद्ध धर्म को समर्पित हैं जबकि एलोरा हिन्दू, बौद्ध व जैन तीनों को समर्पित रहा है।
  • एलीफैंटा में बनी त्रिमूर्ति विश्व प्रसिद्ध है, जो शिव के ही तीनों रूपों की है।
  • कोंकणी मौर्यों के समय इस द्वीप को धारापुरी कहा जाता था, बाद में हाथी की एक विशाल प्रतिमा मिलने के कारण पुर्तगालियों ने इसे एलीफैंटा कहा।

पल्लवकालीन स्थापत्य

  • पल्लव कला के विकास की शैलियों को क्रमश: महेंद्र शैली (610-640 ई.), मामल्ल शैली (640-674 ई.) और राजसिंह शैली (674-800 ई.) में देखा जा सकता है।
  • पल्लव राजा महेन्द्र वर्मन के समय वास्तुकला में ‘मंडप’ निर्माण प्रारंभ हुआ।
  • राजा नरसिंह वर्मन ने चिंगलपेट में समुद्र किनारे महाबलीपुरम उर्फ मामल्लपुरम नामक नगर की स्थापना की और ‘रथ’ निर्माण का शुभारंभ किया।
  • पल्लव काल में रथ या मंडप दोनों ही प्रस्तर काटकर बनाए जाते थे।
  • पल्लवकालीन आदि-वराह, महिषमर्दिनी, पंचपांडव, रामानुज आदि मंडप विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।
  • ‘रथमंदिर’ मूर्तिकला का सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करते हैं जिनमें द्रौपदी रथ, नकुल- सहदेव रथ, अर्जुन रथ, भीम रथ, गणेश रथ, पिंडारी रथ तथा वलैयंकुट्टै प्रमुख हैं।
  • इन आठ रथों में द्रौपदी रथ एकमंज़िला और छोटा है बाकी सातों रथों को सप्त पैगोडा कहा गया है।
  • पल्लव काल की अंतिम एवं महत्त्वपूर्ण ‘राजसिंह शैली’ में Rock cut Architecture के स्थान पर पत्थर, ईंट आदि से मंदिरों का निर्माण शुरू हुआ।
  • राजसिंह शैली के उदाहरण महाबलीपुरम के तटीय मंदिर, अर्काट का पनमलाई मंदिर, कांची का कैलाशनाथ और बैकुंठ पेरूमल का मंदिर आदि हैं।
  • आगे पल्लव काल के नन्दीवर्मन/अपराजिता शैली में संरचनात्मक मंदिर निर्माण की शुरुआत हुई और दक्षिण भारत में एक स्वतंत्र शैली उभरी जिसे द्रविड़ शैली कहा गया।

चोलकालीन स्थापत्य

  • चोल शासकों ने द्रविड़ शैली के अंतर्गत ईंटों की जगह पत्थरों और शिलाओं का प्रयोग कर ऐसे-ऐसे मंदिर बनाए, जिनका अनुकरण पड़ोसी राज्यों एवं देशों तक ने किया।
  • चोल इतिहास के प्रथम चरण (विजयालय से लेकर उत्तम चोल) में तिरुकट्टलाई का सुंदेश्वर मंदिर, कन्नूर का बालसुब्रह्मण्यम मंदिर, नरतमालै का विजयालय मंदिर, कुंभकोणम का नागेश्वर मंदिर तथा कदम्बर- मलाई मंदिर आदि का निर्माण हुआ।
  • महान चोलों (राजराज-से कुलोतुंग-III तक) के दौर में तंजावुर में वृहदेश्वर मंदिर तथा गंगईकोंड चोलपुरम का शिव मंदिर (राजेन्द्र प्रथम का) ख्याति प्राप्त हैं।
  • इन दोनों मंदिरों को देखकर कहा गया कि ‘‘उन्होंने दैत्यों के समान कल्पना की और जौहरियों के समान उसे पूरा किया।’’ (They concept like Giants and they Finished Like Jewellers).
  • इन दोनों के अलावा दारासुरम का ऐरावतेश्वर और त्रिभुवनम का कम्पहरेश्वर मंदिर भी सुंदर एवं भव्य हैं।
  • चोल स्थापत्य की सबसे बड़ी खासियत है कि उन्होंने वास्तुकला में मूर्तिकला और चित्रकला का भी बेजोड़ संगम किया।
  • चोलयुगीन मूर्तियों में नटराज की कांस्य प्रतिमा सर्वोत्कृष्ट है। इसे चोल कला का सांस्कृतिक निकष (कसौटी) कहा गया है।

ओडिशा का स्थापत्य

  • ओडिशा के मंदिर मुख्यत: भुवनेश्वर, पुरी और कोणार्क में स्थित हैं।
  • ओडिशा वास्तुकला की अपनी पहचान में देउल (गर्भगृह के ऊपर उठता हुआ विमान तल), जगमोहन (गर्भगृह के बगल का विशाल हॉल), नटमंडप (जगमोहन के बगल में नृत्य के लिये हॉल), भोगमंडप, परकोटा तथा ग्रेनाइट पत्थर का इस्तेमाल शामिल है।
  • भुवनेश्वर का लिंगराज मंदिर, पुरी का जगन्नाथ मंदिर, कोणार्क का सूर्य मंदिर इस शैली के श्रेष्ठ उदाहरण हैं।
  • सूर्य मंदिर (कोणार्क) का निर्माण गंग वंश के शासक नरसिंह देव प्रथम ने किया था।
  • कोणार्क के सूर्य मंदिर को यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में भी शामिल किया गया है।
  • कोणार्क के ब्लैक पैगोडा (सूर्य मंदिर) के अतिरिक्त उत्तराखंड के अल्मोड़ा में कटारमल सूर्य मंदिर है।
  • लिंगराज मंदिर ओडिशा मंदिर स्थापत्य की संपूर्ण विशेषताओं का सर्वोत्तम उदाहरण है।
विशेष
जैन धर्म से संबंधित गुफा/पहाड़ी
गुफा/पहाड़ी
शासक वंश
कालखंड
क्षेत्र
सोनभद्र पहाड़ी
नंद वंश
चौथी शताब्दी ई.पू.
राजगृह (बिहार)
उदयगिरि और खंडगिरि गुफा
महामेघवाहन वंश के राजा खारवेल ने यहाँ हाथीगुंफा लेख खुदवाया।
ई.पूर्व प्रथम या द्वितीय शताब्दी (मौर्योत्तर काल)
भुवनेश्वर (ओडिशा) से लगभग 8 किमी. दूर स्थित
चंद्रगिरि पहाड़ी
मौर्य वंश के चंद्रगुप्त मौर्य से संबंधित, इस पर्वत के निकट पूर्व मध्यकाल में गंग कदम्ब के मंत्री चामुण्ड राय ने विख्यात बाहुबली की मूर्ति स्थापित की।
मौर्य काल तथा पूर्व मध्य काल
श्रवण बेलगोला (कर्नाटक)
एलोरा की गुफाएँ
राष्ट्रकूट वंश के शासकों के समय में निर्मित एलोरा में कुल 34 गुफाएँ हैं। इनमें हिंदू, बौद्ध और जैन गुफा मंदिर बने हैं। यहाँ 12 बौद्ध गुफाएँ (1–12), 17 हिंदू गुफाएँ (13–29)और 5 जैन गुफाएँ (30–34) हैं। गुफा संख्या- 16 में कृष्ण प्रथम द्वारा एलोरा का प्रसिद्ध कैलाश मंदिर बनवाया गया।
पूर्व मध्य काल
(600–1000 ई.) 
औरंगाबाद (महाराष्ट्र) से लगभग 30 किमी. की दूरी पर स्थित
शत्रुंजय और उर्जयंत पहाड़ी
चालुक्य या सोलंकी वंश के शासक जयसिंह सिद्धराज और कुमारपाल ने जैन मुनि हेमचंद्र के सहयोग से श्रमणों हेतु गुफाओं का निर्माण करवाया।
पूर्व मध्य काल (11वीं-12वीं शताब्दी)
गुजरात
अर्बुदगिरि की पहाड़ी
चालुक्य (सोलंकी) वंश के शासक भीम प्रथम के दौर में निर्मित। यहाँ गुफा के साथ-साथ आदिनाथ का मंदिर, विमल बसाही मंदिर तथा दिलवाड़ा समूह का जैन-मंदिर भी प्रसिद्ध है। यह क्षेत्र चालुक्यों के अधीन था।
पूर्व मध्य काल (10–11वीं शताब्दी)
राजस्थान

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